ऊसर मगहर

शनिवार, 3 जनवरी 2026

पिपरहवा स्तूप का अवशेष जो निलामी से बचा


  पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  की  गौरवशाली  संस्कृति  :   पिपरहवा  स्तूप
 


हांगकांग से वापस रत्नजडित बाक्स 

 उत्तर  प्रदेश  के  पूर्वी भाग  का इतिहास  बड़ा  ही  सार्वभौमिक  व  गौरवशाली  रहा हैं।  जब भारत  के  यशस्वी  प्रधानमंत्री  श्री  नरेन्द्र  मोदी जी  ३  जनवरी  २०२६  को  नई  दिल्ली  के  राय  पिथौरा  सांस्कृतिक  परिसर  में  एक  प्रदर्शनी  में  पिपरहवा  अवशेषों  को  पहली  बार  सार्वजनिक  रूप  से देश  के  सामने  दर्शन  हेतू  प्रस्तुत  करेंगे  तो  एक  बार  पुनः  पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  गौरवान्वित  होगा। 





  • बौद्ध  ग्रन्थ अंगुत्तर  निकाय  के अनुसार  भगवान  बुद्ध  के  जन्म के पूर्व  ६ ठी  शताब्दी  ईसा  पूर्व  भारत वर्ष  सोलह महा जनपदों  में  बटा  हुआ  था।  भारत के प्रमुखतः चार महा जनपदों की  राजधानी  पूर्वी   उत्तर  प्रदेश  में  रहा।
  • महा जनपद                             राजधानी                          वर्तमान  भाग   
  1. काशी                                       वाराणसी                          वनारस  के आस -पास 
  2. वत्स                                          कौशाम्बी                          इलाहबाद  के  आस -पास  
  3. कोशल                                     श्रावस्ति                            फैजाबाद , गोण्डा , बहराइच  आदि 
  4. मल्ल                                         कुशावती                          देवरिया , गोरखपुर , बस्ती  आदि 
  • गौतम  बुद्ध  का  जन्म ५६३ ईसा पूर्व  कपिलवस्तु  के  लुम्बनी  नामक  स्थान ( वर्तमान  में सिद्धार्थ नगर उत्तर  प्रदेश ) पर  हुआ  था। इनके पिता शुद्धोधन शाक्य  गणराज्य  के  प्रमुख  थे। ८० वर्ष की उम्र में  कुशीनारा ( वर्तमान  में  कुशीनगर  उत्तर  प्रदेश ) में ४८३ ईसा पूर्व  महा परि निर्वाण  हुआ। 
  • भारत  में  अभिलेखों  का  प्रचलन सम्राट  अशोक  के  समय  हो  गया था। जिसे तीन  भागों  में  बाटा  गया  हैं। १ - शिलालेख  २ - स्तम्भ लेख  ३ - गुहा लेख 
  • पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  में  कई  स्थानों पर  उत्खनन  कार्य  हुआ, कई  अभिलेख  प्राप्त  हुए  जो  यहाँ  के  समग्र इतिहास  के  वैभव  का  परिचय  कराते है। जिनमें कुछ  प्रमुख  अभिलेख -







                                                          
  1. सोहगौरा  ताम्र पत्र  अभिलेख बासगांव ,गोरखपुर 
  • काल - मौर्य काल (चन्द्रगुप्त  या  अशोक  के  समय }
  • लिपि / भाषा - ब्राह्मी लिपि /प्राकृत  भाषा 
  • महत्वतत्कालिन  प्रशासनिक  व्यवस्था , कृषि  अर्थ व्यवस्था,शासक  का  कर्तव्य (राज धर्म ) 
      २. पिपरहवा  बौद्ध  कलश  अभिलेख ,सिद्धार्थ नगर 
 
  •  काल - ५ वी  शताब्दी  ई
    सा  पूर्व 
  •  लिपि - ब्राह्मी 
  •  महत्व - सकियान (शाक्यों ) और सुकिति भतिनि (भगवान  बुद्ध के भाइयों )द्वारा  स्तूप  निर्माण 
       ३. रुम्मिन देई  अभिलेख ,लुम्बिनी  निकट  सिद्धार्थ  नगर 
        
  • काल -सम्राट  अशोक के  राज्याभिषेक  के २० वर्ष बाद 
  • लिपि - ब्राह्मी  लिपि 
  • महत्व - अशोक  द्वारा धम्म यात्रा  के  दौरान  साक्य मुनि  के याद  में  प्रस्तर  स्तम्भ  स्थापित     
       ४. सारनाथ  स्तम्भ लेख (अशोक  स्तम्भ ) वाराणसी 

  •   काल -सम्राट  अशोक   २५०  ईसा  पूर्व 
  •   लिपि -ब्राह्मी लिपि 
  •   भारत  गणतंत्र  का राज्य  चिन्ह 
       ५ .प्रयाग स्तम्भ  लेख (रानी  का  अभिलेख ) कौशाम्बी 
  • काल - २००  ईसा  पूर्व 
  • लिपि- ब्राह्मी लिपि 
  • महत्व - समुद्रगुप्त  के  समय  दरबारी  कवि  हरिषेण द्वारा रचित  

       ६. मधुवन ताम्र पत्र  अभिलेख ,मऊ  
  • काल - हर्ष वर्धन ( हर्ष संवत २२ ) ६३१ ईसा 
  • भाषा - संस्कृत 
  • महत्व - भूमिदान /प्रशासनिक  व्यवस्था 
        ७. स्कन्दगुप्त  का भितरी  स्तम्भ  अभिलेख ,सैद्पुर  गाजीपुर 

  • काल -४५५  ई -४६७ ई 
  • लिपि - उत्तर  ब्राह्मी लिपि /संस्कृत भाषा 
  • महत्व -गुप्तवंश  की  वंशावली /पुष्पमित्रों  का अभिलेख 


           पिपरहवा ( कपिल वस्तु ) का उत्खनन  कार्य  १८९८ ई. व्रिटिश उत्खननकर्ता विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्व्रारा कराया  गया  था।  उत्खनन  के  अधिकांश  भाग  भारतीय  संग्रहालय  कोलकता  को  सौंप दिए थे। अवशेष  के  कुछ  भाग  अपने  पास  रख  लिये।  जिसमें क्रिस्टल  के  ताबूत , हड्डियों  के  टुकड़े , सोने  के आभूषण आदि  बस्तुए  हैं। 

            विलियम  के  चौथे पीढ़ी  के  लोगों  के  द्वारा  इन्हीं  अवशेषों   को  ७  मई  २०२५  को  हांगकांग  में  निलामी  बाजार  में  लाया  जाना  था।  इस  नीलामी  को  रोकने  के  लिये  सिद्धार्थ  विश्वविद्यालय  के  प्राचीन  इतिहास  के  प्रोफेसर   शरदेन्दु  कुमार  त्रिपाठी  ने प्रधानमंत्री  मोदी  को  पत्र  भेजा। भारतीय  पुरातत्व  सर्वें  ( ए  एस  आइ ) ने  हांगकांग  में  भारतीय   दूतावास  से  सम्पर्क किया।  ३०  जुलाई  २०२५  को भारत  के  संसकृति  मंत्रालय  व  गोदरेज  ग्रुप  के पिरोज  शा  के  सहयोग  से  भारतीय  अस्मिता  को  वापस  लाया  जा  सका। 

              ३  जनवरी  २०२६  को  नई  दिल्ली  में  सार्वजनिक  दर्शन  हेतु  रखा  जायेगा।  बौद्ध  धर्म  के  अनुवाईयो  के  लिए  महत्व  का  दिन  होगा। 
                                                                                            BRAHMA NAND GUUPTA






























पिपरहवा स्तूप का अवशेष जो निलामी से बचा

  पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  की  गौरवशाली  संस्कृति  :   पिपरहवा  स्तूप   हांगकांग से वापस रत्नजडित बाक्स   उ त्तर  प्रदेश  के  पूर्वी भाग  का इ...