कासी - मगहर सम बिचारि
संत कबीर जी का मगहर आगमन और काशी को छोड़ कर बड़ा ही रोचक लगता है। एकदम उनकी उलटवासीयों की तरह। कबीर काशी के माहौल से खुद त्रस्त थे,पीड़ित मन से कहते है कि -मै क्यू कासी तजै मुरारी । तेरी सेवा-चोर भये बनवारी ।।
जोगी-जती-तपी संन्यासी। मठ -देवल बसि परसै कासी।।
तीन बार जे नित् प्रति न्हावे। काया भीतरि खबरि न पावे।।
देवल - देवल फेरी देही। नाम निरंजन कबहु न लेही।।
चरन-विरद कासी को न दैहू। कहै कबीर भल नरकहि जैहू।।
दिन में तीन -तीन बार गंगा में नहा कर ,खूब बड़े -बड़े टीके लगा कर कासी के मंदिरों का चक्कर लगा कर, अपने को भगवान का सबसे प्रिय होने का घमण्ड करने वाले लोगों के मन में खोंट है। तेरे सेवा में चोर -उचकै लगे है,मै कासी छोड़ मगहर जा रहा हूँ। इस कासी की दुर्गति अब नहीं देख सक -ता। और कासी -मगहर मेरे लिये समान है ,चाहे जहां मरु। और कहते है क़ि -
क्या कासी क्या ऊसर -मगहर, राम रिदै बसु मोरा।
जो कासी तन तजै कबीरा , रामे कौन निहोरा।
आदि ग्रंथ में एक पंक्ति है -
अब कहु राम कवन गति मोरी। तजिले बनारस मति भई थोरी।
सगल जनमु शिवपुरी गवाइआ।मरती बार मगहर उठि आइया।
कबीर के मन में कासी के राज -व्यवस्था के प्रति छोभ था ,समाजिक व्यवस्था डगमगा गया था। और कासी छोड़ मगहर आ गए। जो सबसे न्यारा: है,न कोई भेदभाव न कोई राग -द्वेस और न कोई वैर -भाव ,इन द्वंदों से परे ऊसर- मगहर। एक स्थान से दूर जाने का मन में कष्ट,मन की व्यथा को रोकते नहीं और कहते है - कहै कबीर भल नरकहि जैहू।
डॉ राम कुमार वर्मा आदि कई विचारकों ने कबीर का मगहर के प्रति जो लगाव है ,उसे कबीर का अपने जन्म -स्थान के प्रति भाव प्रदर्शित होना बताते है। जो भी हो मरते वक्त भी कबीर एकता और सौहार्द का जो बीज बोया वह अनन्त काल तक पुष्पित व् प्लवीत होगा। जो प्रेम का धागा संत कबीर ने बुना उसे देख मन कह उठता है कि -
नाचै ताना नाचै बाना , नाचै कूच पुराना।
री माई कों बिनै।
करगहि बैठि कबीरा नाचे,चूहें काट्या ताना।
ऱी माई को बिनै।
जो प्रेम - भाव का धागा कबीर करिघे पर कात रहे है, उसे कुतरने वाल़े समाज के चूहों से कबीर परेशान व हैरान है। और कह रहे है , अरे इसे किस तरीके से इन चूहों से बचाया जाए। जिससे समाज में सरसता का भाव जागे। आपस के वैर - भाव, ऊँच- नीच, गरीब- अमीर का भेद को कैसे खत्म किया जाए।
आदि - ग्रंथ में रागु रामकली में है कि - तोरे भरोसे मगहर बसिओ ,मेरे मन की तपति बुझाई। पहिले दरसनु मगहर प़ाइओ, पुनि कासी बसे आई।.
कबीर कहते है कि पहले हम मगहर में आप का दरसन पाकर ही कासी में आया हूँ। कबीर दास का मन कासी से ऊब गया है।
आपके भरोसे मगहर जा रहा हूं। मन की शांति मुझे मगहर में मिलेगी। मुझे कासी छोड़ देना ठीक है। कबीर का मगहर के प्रति आस्था -भाव व लगाव से विदित होता है कि कबीर मगहर से पूर्व परिचित थे। आज हमें उनके सब्दों को आत्मसात करने की जरुरत है। संत कबीर कहते हैं कि कासी -मगहर सम बिचारि। कबीर के लिये चाहें कासी हो, चाहें मगहर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। कबीर का मगहर आगमन हुआ। मगहर मरण से नरक होता हैं, इस धारणा को चुनौतीपूर्ण स्वीकार कर मगहर में ही निर्वाण किया। वैसे कबीर का ज्ञान, वैभव व मुक्ति की नगरी कासी छोड़ कर, ऊसर व वीरान स्थल मगहर आना। आमी नदी के तट पर वैष्णव संत केसरदास, गुरुनानक देव, संत कबीर व गोरक्षपीठ के गोरखनाथ का उस समय में एक आध्यत्मिक गोष्ठी करके मगहर को एक केंद्र बिन्दु के रूप में प्रतिष्ठित करना। मगहर की महत्ता रेखांकित करता हैं। वैष्णव पंथ, नानक पंथ, कबीर पंथ व नाथ पंथ के संन्तों की गोष्ठी का आयोजन ही मगहर को एक सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान किया। जो आज भी कायम है। आमी के तट पर गोरख - तलैया, कसरवल कुटी जो आज भी विद्यमान हैं। संत केसरदास के ही नाम पर कसरवल ग्राम प्रचलित हुआ।
■ ब्रह्मानंद गुप्त
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