ऊसर मगहर

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

कबीर काव्य : हंस की महत्ता

    संस्कृत में श्लोक है -

हंसः श्वेतः,बकः श्वेतः,को भेदः बक - हंसयोः।

 नीर - क्षीर - विवेके तु, हंसो हंसः, बको बकः।।

     हंस और बगुला दोनों सफेद होते है। लेकिन दोनों में गुण - दोष का अन्तर है। हंस नीर - क्षीर विवेक रखता है। हंस दूध और पानी के मिश्रण से दूध अलग करने की क्षमता रखता है। हंस पारखी होता है।इसे कबीर दास अपने शब्दों में कहते है। दोनों का रंग  एक समान, दोनों एक ही स्थान पर रहते भी है। परन्तु आचरण से पहचान करना जरूरी है।

 हंस बकु देखा एक रंग, चरें हरियरे ताल।

 हंस क्षीर  ते जानिये,बकुहिं धरेगें काल।।

     कबीर दास के काव्य संग्रह में हंस का प्रयोग कई पदों में हुआ है। हंस के नीर - क्षीर विवेक  को कबीर दास  के शब्दों में - दूध का दूध, पानी का पानी करना। सही-गलत का पहचान करना।

नीर  क्षीर  निर्णय करे, हंस  लक्ष सहिदान।

दया रूप थिर पद रहे, सो पारख पहिचान।।

      पारख - परख का अर्थ है - छानबीन करना, गुण - दोष देखना,   अच्छे - बुरे का ज्ञान होना। पारखी का पहचान यानि नीर - क्षीर  निर्णय करना। कबीर दास उसे अपना समझते है - 

कागा कुबुधि निकट नहि आवैं।

प्रतिदिन  हंसा  दर्शन  पावै।।

नीर  क्षीर  का  करै  निवेरा।

कहैं  कबीर  सोई जन मेरा।।

     कबीर काव्य  में हंस शब्द का प्रयोग  आत्मा के लिए भी किया गया है।  

जब गढ़ पर बजी बधाई,तब देख तमासे जाई।

जब गढ बीच होत सकेला,तब हंसा चलत अकेला।।

  कबीर दास  - 'कर्म फल भोग' को मानते है। जैसा करोगें वैसा भरोगें। भारतीय परम्परा का दार्शनिक पक्ष है। उसे मजबूत कर सम्बोधित करते है।यह शरीर  मान सरोवर है, इसमें चेतन हंस  निवास करता है। जब हंस उड़कर चला जाता तो बाद में पश्चाताप  के अलावा कुछ नही रह जाता।

 हंसा सरवर तजि चले,

 देही परिगौ सून।

 कहहिं कबीर पुकारि के,

 तेहि दर तेहि थून।।

     कबीर दास को हंस बड़ा प्यारा लगता है -


 हंसा तू सुवर्ण वर्ण, क्या वर्णो मैं तोहि।

 तरिवर पाय पहेलिहो,तबै सराहौं तोहि।।      

   सुवर्ण का अर्थ - सुनहले रंग,  क्या वर्णो का अर्थ - क्या वर्णन करना, तरिवर का अर्थ - पेड़ और  सराहौं का अर्थ  - सराहना करना। 

कबीर काव्य में हंस शब्द नीर - क्षीर विवेक निर्णय के रूप में और आत्मा के रूप में कई पदों में मिलता है।







सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

कबीर काव्य : आर्थिक पक्ष

 

            संत कबीर गरीब परिवार के है। संत श्रमिक म श्रम की कीमत खूब अच्छे से जानते है। गरीब घर से है तो धन कीमत भी समझते है। फिर भी धन संग्रह के घोर विरोधी है। अभाव में रहना उन्हे पसन्द है। और कहते है -

भूखा - भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग।

भाँडा घड़ि जिन मुख दिया, सोई पूरण जोग।। ■  

   

           भूख - भूख क्या करते हो ? किसे सुनाते हो ? भाँडा घड़ि का अर्थ है - बर्तन बनाना।  कबीर दास  विश्वास  से  कहते हैं कि  जिसने यह शरीर रूपी भाँड बनाया है, वही भूख की पूर्ति  भी करेगा। एक सीमा रेखा रेखांकित करते है -

 

साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय।

मै भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।। ■  


           भोग-विलास,भोगवाद - दुनियाभर की एक ही परेशानी है।सीमित मानव की असीमित आवश्यकता आवश्यकतानुसार धन चाहिए। 


 उदर समाता अन्न लै, तनहि समाता चीर।

अधिकहि संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर।। ■ 


           संत कबीर अधिक संग्रह को निषेध मानते। समाज में असमानता का सबसे बड़ा कारण धन संग्रह को मानते है। उनका मानना है कि अभाव ही ईश्वर के समीप ले जाने कारक है। भोगवाद ही सभी समस्याओं का जड़ है।


रूखा सूखा खाय के, ठंड़ा पानी पीव।

देख पराई चुपड़ी, मत ललचावै जीव।। ■


           जितना मिले उसी में सन्तोष करो। सन्तोष में ही परम सुख है। बिना मांगे, बिना चाहे जो मिल जाए वो दूध के समान होता। मांग कर जो मिले वो पानी के समान। जिसकों पाने में ज्यादा खींचातानी हो वह रक्त के समान दूषित हैं -


अनचाहे सो दूध बराबर, मांगे मिले सो पानी।

कहहिं कबीर  सो रक्त बराबर, जामे ऐंचातानी।। ■


           और कहते है कि -


आधी जो रूखी भली, सारी सोग सन्ताप। 

जो चाहेगा चूपड़ी, तो बहुत करेगा पाप ।। ■ 


          दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बस उतना ही चाहिए कि दोनों समय का भोजन मिल जाए। दो सेर आटा, आधा सेर दाल और थोड़ा-बहुत घी मिल जाए -


 दुई सेर मांगउ चूना, पाउ घीउ संगि लूना।

अध सेर मांगउ दाले,मोकउ दोनउ बखत जिवाले।। ■ 


संत न बांधे गाँठरी, पेट समाता लेई। ■


         इससे ज़्यादा हमें क्यों चाहिए ? किसके लिए चाहिए ? जिनको हम संग्रह करके सम्पन्न बनाने में अपना जीवन खपा दे पता नही वह उसे संभाल पावे। कपूत मिल गया तो चाहें जितना कमा कर संग्रह कर लो, उसे खत्म करने में समय नही लगेगा।


 पूत सपूत तो का धन संचै। पूत कपूत तो का धन संचै।। ■



           संत कबीर दास समाज में असमानता की खाई को पाटने की पुरजोर कोशिश करते है। आर्थिक - सामाजिक पक्ष का मजबूत आधार तैयार करते है -


जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।

दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।। ■


            धन संग्रह हो भी जाए  तो दोंनो हाथ से समाज में बाटने को कहते है। जैसे नाविक नाव में ज्यादा पानी होने पर खतरा भाप कर पानी निकालने का यत्न करता है।

             अनिश्चित, अनियंत्रित  सांसारिक कामनाएँ  ही कष्टों की जड़ है। जो इस पर विजय पाया वही इस संसार का राजा है। संत कबीर दास  कहते है -


 चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।

जाको कछु नाहिं चाहिए, सो साहन को शाह।। ■


              कबीर दास उद्यम  में विश्वास रखते है। आर्थिक  तंगी से निपटने के लिए उद्यम करने को कहते है। जिससे पेट पालने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर ना रहें। परिश्रम व कर्म करके ग़रीबी दूर करने का उपाय बताते है। कहते है -


  कबीर उद्यम अवगुण को नहीं,जो करि जाने कोय। 

  उद्यम  में  आनन्द  है, सांई  सेती  होय ।।■


         मनुष्य मान, सम्मान व गर्व सब कुछ खो देता है, जब किसी से कुछ मांगना पड़ता है -


  मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।

  ए सबही अहला गया,जबहीं कह्या कुछ देय।।■

             कबीर दास उतना ही धन संग्रह करने को कहते है।जिससे आज का पेट पालन कर सके। आगे भी पेट पाल सके। कबीर साहब कहते है -

कबीर  सो धन संचिये, जो  आगे  कूं  होई। 

सीस चढ़ाये पोटली,ले जात न देख्या कोई। 


           मृत्यु के बाद धन को कोई गठरी बांध ले जाते नही दिखा। यानि सत्कर्म ही मनुष्य के साथ जाता है।धन दौलत यही छोड़कर कर चला जाता है।

 
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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

संतों घर में झगरा भारी: संत कबीर दास

 

संतो घर में झगरा भारी।

राति दिवस मिली उठि उठि लागै,

पाँच ढोटा एक नारी।

न्यारो न्यारो भोजन चाहै,

पाँचों अधिक सवादी।।     संत कबीर दास 

     कबीर दास  कहते है कि माया ने घर में बड़ा  भारी झगड़ा लगा लगा रखा है। माया ही सबको बाँधना चाहती है। पाँच ढोटा यानि पाँच ज्ञानेंद्रियाँ : आँख - सुन्दर रूप से, कान - मीठे बात से, नाक - गंध से, जीभ - स्वाद से और त्वचा - स्पर्श से।  पाँचों  अकेले बुद्धि से रोज झगड़ा करने पर उतारू है। अतः बुद्धि इनसे परेशान हो गई।  बुद्धि इन पाँच को संयम सिखाना चाहती। लेकिन मानने को तैयार नही क्योंकि वे सवादी हो गई हैं। सवादी का अर्थ - भयंकर स्वाद की इच्छा वाला, जो कम होने का नाम ही नही लेता। नया - नया  भोजन रोज चाहिए। एक नारी यानि  अकेले बुद्धि, इनसे कितना लड़े। लड़ाई करते - करते बुद्धि भ्रम में पड़ गई है।

         मनुष्य को मायाजाल घेर रखा है। माया मोह  के कारण मनुष्य सही-गलत का पहचान नही कर पा रहा। प्रपंच जाल में सभी जीव फंसे है। अज्ञान ही प्रपंच जाल है। समाज व परिवार से भावनात्मक लगाव का स्थान दिखावाँ  का हो गया है। जिसमे हम आप सभी दोषी है।

      आज  के परिवेश में कबीर दास के 600 साल पहले कहा गया शब्द कितना प्रासंगिक हैं। वह सोच  से परे हैं। उनका कहा गया एक - एक शब्द शोध  का विषय बन गया है। पारिवारिक संबंध खराब होते जा रहे है। सिर्फ औपचारिकता मात्र दिखावां रह गया हैं। भाई - भाई, भाई - बहन, चाचा - भतीजा, पिता-पुत्र सबका आपसी समझ, सम्बन्ध, सम्मान कमजोर होता जा रहा। इस दूरी का कारण आधुनिक युग की भोगलिप्सा, जिससे समाज दूषित व कलुषित हो रहा।

      आज  के मोबाइल  युग में खासकर युवा पीढ़ी, जिसे जेंन जी से सम्बोंधित किया जा रहा। कम्युनिकेशन गैप का शिकार  होता जा रहा है। युवा पीढ़ी परिवार से, नाते - रिश्तेदार से दूर होता जा रहा हैं।  यह विषय चिन्तन व मनन का है। इस संक्रमण काल  में इससे कैसे बचा जाए  हमें सोचना होगा।

       कबीर दास पारिवारिक सम्बन्धों  की औपचारिकताओं  का भंडाफोड़ करते है । मृत्यु भोज पर प्रहार करते हुए कहते है-

जीवत पित्रहिं मारहि डंडा, मूवां पित्र लै घालै गंगा।

जीवत पित्र कूं अन न ख्यांवे,मूवां पाछैं प्यंड भरावै।।

जीवत पित्र कूं बोलैं अपराध, मूवां पीछैं देहि सराध।

कहै कबीर मोहि अचरज आवै,कउवा खाइ पित्र क्यू पावै।।

       कबीर दास समाज की सच्चाई को दिखाकर  कहते है कि जब माता - पिता की सेवा की जरुरत थी, तब तो किआ नही । अरे पगले जब वे इस दुनिया में नही है, तो झूठा दिखावा क्यों कर रहा ? जिन्दा रहने पर बोलने से परहेज किआ। अब श्राद्ध कर्म करने से क्या होगा। मृत्यु के बाद कौन देखने आ रहा ? मनुष्य अपना जीवन धोखें में जी रहा।

        उमरिया धोखे में खोय दियो।

पांच बरस का भोला भाला,बीस में जवान भयो।।

तीस बरस में माया के कारन, देस  बिदेस गयो।

चालीस  बरस अन्त अब लागे, बाढ़े  मोह  गयो।।

धन  धाम  पुत्र के कारन, निस  दिन सोच भयो।

बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो।।

लरिका  बहुरी  बोलन  लागे, बूढ़ा  मर  न  गयो।

बरस  साठ - सत्तर के भीतर, केश  सफेद भयो।।

वात  पित कफ घेर लियो है, नैनन  नीर  बयहो।

न हरि भक्ति न साधू की संगत,न शुभ कर्म कियो।।

कहे कबीर सुनो भाई साधो, चोला  छूट  गयो।

उमरिया धोखे मे खोय दियो।।

                                                       □ ब्रह्मानंद गुप्त

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कबीर काव्य : हंस की महत्ता

    संस्कृत में श्लोक है - हंसः श्वेतः,बकः श्वेतः,को भेदः बक - हंसयोः।  नीर - क्षीर - विवेके तु, हंसो हंसः, बको बकः।।      हंस और बगुला दोनो...