ऊसर मगहर

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

कबीर काव्य : आर्थिक पक्ष

 

            संत कबीर गरीब परिवार के है। संत श्रमिक म श्रम की कीमत खूब अच्छे से जानते है। गरीब घर से है तो धन कीमत भी समझते है। फिर भी धन संग्रह के घोर विरोधी है। अभाव में रहना उन्हे पसन्द है। और कहते है -

भूखा - भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग।
भाँडा घड़ि जिन मुख दिया, सोई पूरण जोग।। ■  
   
            भूख - भूख क्या करते हो ? किसे सुनाते हो ? भाँडा घड़ि का अर्थ है - बर्तन बनाना।  कबीर दास  विश्वास  से  कहते हैं कि  जिसने यह शरीर रूपी भाँड बनाया है, वही भूख की पूर्ति  भी करेगा। एक सीमा रेखा रेखांकित करते है -
 
साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय।
मै भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।। ■  

           भोग-विलास,भोगवाद - दुनियाभर की एक ही परेशानी है।सीमित मानव की असीमित आवश्यकता आवश्यकतानुसार धन चाहिए। 

 उदर समाता अन्न लै, तनहि समाता चीर।
अधिकहि संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर।। ■ 

           संत कबीर अधिक संग्रह को निषेध मानते। समाज में असमानता का सबसे बड़ा कारण धन संग्रह को मानते है। उनका मानना है कि अभाव ही ईश्वर के समीप ले जाने कारक है। भोगवाद ही सभी समस्याओं का जड़ है।

रूखा सूखा खाय के, ठंड़ा पानी पीव।
देख पराई चुपड़ी, मत ललचावै जीव।। ■

           जितना मिले उसी में सन्तोष करो। सन्तोष में ही परम सुख है। बिना मांगे, बिना चाहे जो मिल जाए वो दूध के समान होता। मांग कर जो मिले वो पानी के समान। जिसकों पाने में ज्यादा खींचातानी हो वह रक्त के समान दूषित हैं -

अनचाहे सो दूध बराबर, मांगे मिले सो पानी।
कहहिं कबीर  सो रक्त बराबर, जामे ऐंचातानी।। ■

           और कहते है कि -

आधी जो रूखी भली, सारी सोग सन्ताप। 
जो चाहेगा चूपड़ी, तो बहुत करेगा पाप ।। ■ 

          दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बस उतना ही चाहिए कि दोनों समय का भोजन मिल जाए। दो सेर आटा, आधा सेर दाल और थोड़ा-बहुत घी मिल जाए -

 दुई सेर मांगउ चूना, पाउ घीउ संगि लूना।
अध सेर मांगउ दाले, मोकउ दोनउ बखत जिवाले।। ■ 

संत न बांधे गाँठरी, पेट समाता लेई। ■

         इससे ज़्यादा हमें क्यों चाहिए ? किसके लिए चाहिए ? जिनको हम संग्रह करके सम्पन्न बनाने में अपना जीवन खपा दे पता नही वह उसे संभाल पावे। कपूत मिल गया तो चाहें जितना कमा कर संग्रह कर लो, उसे खत्म करने में समय नही लगेगा।

 पूत सपूत तो का धन संचै। पूत कपूत तो का धन संचै।। ■


            संत कबीर दास समाज में असमानता की खाई को पाटने की पुरजोर कोशिश करते है। आर्थिक - सामाजिक पक्ष का मजबूत आधार तैयार करते है -

जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।। ■

            धन संग्रह हो भी जाए  तो दोंनो हाथ से समाज में बाटने को कहते है। जैसे नाविक नाव में ज्यादा पानी होने पर खतरा भाप कर पानी निकालने का यत्न करता है।
             अनिश्चित, अनियंत्रित  सांसारिक कामनाएँ  ही कष्टों की जड़ है। जो इस पर विजय पाया वही इस संसार का राजा है। संत कबीर दास  कहते है -

 चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।
जाको कछु नाहिं चाहिए, सो साहन को शाह।। ■

 

 



 



       


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

संतों घर में झगरा भारी: संत कबीर दास

 

संतो घर में झगरा भारी।

राति दिवस मिली उठि उठि लागै,

पाँच ढोटा एक नारी।

न्यारो न्यारो भोजन चाहै,

पाँचों अधिक सवादी।।     संत कबीर दास 

     कबीर दास  कहते है कि माया ने घर में बड़ा  भारी झगड़ा लगा लगा रखा है। माया ही सबको बाँधना चाहती है। पाँच ढोटा यानि पाँच ज्ञानेंद्रियाँ : आँख - सुन्दर रूप से, कान - मीठे बात से, नाक - गंध से, जीभ - स्वाद से और त्वचा - स्पर्श से।  पाँचों  अकेले बुद्धि से रोज झगड़ा करने पर उतारू है। अतः बुद्धि इनसे परेशान हो गई।  बुद्धि इन पाँच को संयम सिखाना चाहती। लेकिन मानने को तैयार नही क्योंकि वे सवादी हो गई हैं। सवादी का अर्थ - भयंकर स्वाद की इच्छा वाला, जो कम होने का नाम ही नही लेता। नया - नया  भोजन रोज चाहिए। एक नारी यानि  अकेले बुद्धि, इनसे कितना लड़े। लड़ाई करते - करते बुद्धि भ्रम में पड़ गई है।

         मनुष्य को मायाजाल घेर रखा है। माया मोह  के कारण मनुष्य सही-गलत का पहचान नही कर पा रहा। प्रपंच जाल में सभी जीव फंसे है। अज्ञान ही प्रपंच जाल है। समाज व परिवार से भावनात्मक लगाव का स्थान दिखावाँ  का हो गया है। जिसमे हम आप सभी दोषी है।

      आज  के परिवेश में कबीर दास के 600 साल पहले कहा गया शब्द कितना प्रासंगिक हैं। वह सोच  से परे हैं। उनका कहा गया एक - एक शब्द शोध  का विषय बन गया है। पारिवारिक संबंध खराब होते जा रहे है। सिर्फ औपचारिकता मात्र दिखावां रह गया हैं। भाई - भाई, भाई - बहन, चाचा - भतीजा, पिता-पुत्र सबका आपसी समझ, सम्बन्ध, सम्मान कमजोर होता जा रहा। इस दूरी का कारण आधुनिक युग की भोगलिप्सा, जिससे समाज दूषित व कलुषित हो रहा।

      आज  के मोबाइल  युग में खासकर युवा पीढ़ी, जिसे जेंन जी से सम्बोंधित किया जा रहा। कम्युनिकेशन गैप का शिकार  होता जा रहा है। युवा पीढ़ी परिवार से, नाते - रिश्तेदार से दूर होता जा रहा हैं।  यह विषय चिन्तन व मनन का है। इस संक्रमण काल  में इससे कैसे बचा जाए  हमें सोचना होगा।

       कबीर दास पारिवारिक सम्बन्धों  की औपचारिकताओं  का भंडाफोड़ करते है । मृत्यु भोज पर प्रहार करते हुए कहते है-

जीवत पित्रहिं मारहि डंडा, मूवां पित्र लै घालै गंगा।

जीवत पित्र कूं अन न ख्यांवे,मूवां पाछैं प्यंड भरावै।।

जीवत पित्र कूं बोलैं अपराध, मूवां पीछैं देहि सराध।

कहै कबीर मोहि अचरज आवै,कउवा खाइ पित्र क्यू पावै।।

        कबीर दास समाज की सच्चाई को दिखाकर  कहते है कि जब माता - पिता की सेवा की जरुरत थी, तब तो किआ नही । अरे पगले जब वे इस दुनिया में नही है, तो झूठा दिखावा क्यों कर रहा ? क्यों अपना समय धोखे में बिताए ? 

        उमरिया धोखे में खोय दियो।

पांच बरस का भोला भाला,बीस में जवान भयो।।

तीस बरस में माया के कारन, देस  बिदेस गयो।

चालीस  बरस अन्त अब लागे, बाढ़े  मोह  गयो।।

धन  धाम  पुत्र के कारन, निस  दिन सोच भयो।

बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो।।

लरिका  बहुरी  बोलन  लागे, बूढ़ा  मर  न  गयो।

बरस  साठ - सत्तर के भीतर, केश  सफेद भयो।।

वात  पित कफ घेर लियो है, नैनन  नीर  बयहो।

न हरि भक्ति न साधू की संगत,न शुभ कर्म कियो।।

कहे कबीर सुनो भाई साधो, चोला  छूट  गयो।

उमरिया धोखे मे खोय दियो।।

                                                       □ ब्रह्मानंद गुप्त

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

मगहर : संत गरीब दास के शब्दों में

 MAGHAR : From the Words of Saint Garib Das


        मगहर - शब्द जब उच्चारित होता हैं, तो मानस - पटल पर एकाएक संत कबीर दास का नाम आ जाता हैं। काशी जैसा विद्वत समाज, काशी जैसी वैभव व आध्यत्मिक नगरी को छोड़कर मगहर जैसें वीरान व ऊसर स्थल को चुनौतीपूर्ण स्वीकार करना, कबीर जैसा कोई विरला संत ही कर सकता हैं। प्रश्न उठना स्वभाविक हैं कि कबीर दास का मगहर आगमन कैसे  व क्यों हुआ ? समकालीन व परर्वती संतों के अनुसार इसके कई कारण हो सकते हैं। यथा -



  • क्या मगहर में जन्म  स्थान  होने के कारण ? जैसा कि गुरु ग्रन्थ साहिब का एक दोहा है -  पहले दरसन मगहर पाईओ, पुनि कासी वस आइ । कथनानुसार यहां कबीर दास मगहर से पूर्व परिचित लगते हैं।
  • क्या मगहर में सूखाग्रस्त (अकाल) होना व जलवृष्टी  के लिए, 1514 ई. में नवाब बिजली खान  के अनुरोध पर आए ?
  • क्या तत्कालीन राज-सत्ता के विरोध के कारण ? जैसाकि जनश्रुति में प्रचलित हैं। सिकंदर साह लोदी ने दंड देने का कई बार असफल प्रयास किए। 

  •  क्या काशी में तत्कालीन पण्डितों व मौलवियों कें विरोध के कारण बनारस को त्यागना पड़ा ? तत्कालीन पंडित और  मौलवी कबीर के तार्किक ज्ञान व प्रमाण से भय महसूस करने लगे।
  • क्या तत्कालीन  समाज में व्याप्त अन्धविश्वास मगहर मरण से मुक्ति न होना, प्रचलित कथन का संसय दूर करने के लिए ?
        संत कबीर दास अपने जीवन के अंतिम दिनों में मगहर आए, और मगहर में 1518 ई. में निर्वाण हुआ। आदि ग्रन्थ में एक पद मिलता है, बनारस के साथ वे अपना सम्बन्ध जल  विन  मछली जैसा कहते है। बहुत ही दुखीं मन से काशी का त्याग करते हैं।

 ज्यों जल छाड़ि बाहर भयो मीना।पूरब जनम हौं तप का हीना।
 अब कहु राम कवन गति मोरी।तजिले बनारस मति भइ थोरी ।
 बहुत बरस तप किया कासी।  मरनु भया मगहर की वासी ।
 कासी मगहर  सम बिचारी। ओछी भगति कैसे उतरसि पारी ।
 कहु गुर गजि सिव संभु को जानै।मुआ कबीर रमता श्री रामै।

             इन सभी प्रश्नों के उत्तर के तलाश में हमें, संत कबीर के समकालीन व परवर्ती सन्तों के साहित्य व उनके शब्दों को देखकर  समझना आसान होगा। मगहर आगमन के बारें में कबीर दास व उनके प्रमुख शिष्य धर्मदास की वाणी, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, संत गरीब दास का रत्न सागर, संत मलूक दास की वाणी आदि कई परवर्ती सन्तों के उद्धरण मिलते हैं। संत नाभा दास ,भक्त माल में कबीर के बारे में लिखा। संत पीपा, रैदास, दादू आदि कई संन्तों, मोहसिन फानी द्वारा रचित दबिस्तान ए तवारिख, खजीनत उल असफियां में भी उल्लेख हैं।
 
       संत गरीब दास (1717 - 1778 ई.) मगहर के बारे में अपने सदग्रंथ साहिब (रत्न सागर) में कई बार ज़िक्र किए है। संत गरीब दास कबीर पंथ के अनुआई थे। कबीर दास पर उन्होंनें हजारों पद लिखें हैं। लेखक भलेराम बेनीवाल  के पुस्तक -  जाट योद्धाओं का इतिहास के अनुसार संत गरीब दास  का जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन संवत 1774 (1717 ई.) को ग्राम छुड़ानी,रोहतक (हरियाणा) में हुआ था। अनुराग सागर  व कबीर चरित्र बोध  में संत कबीर के बारह पंथों का विवरण मिलता हैं। बारहवाँ पंथ गरीब दास पंथ है।  बन्दीछोंड़ गरीब दास लिखते हैं -

सत गुरु कीन्हा मगहर पियाना हो।■
दोन्यूं दीन चले संगि जाकै, हिंन्दू मुसलमाना हो ।। १
मुक्ति खेत कूॅ छाडि चले है, तजि काशी असथाना हो।■
शाह सिकन्दर कदम लेत है, पतिशाह सुलताना हो ।। २
च्यार वेद के बकता संगि हैं, खोजी बड़े बयाना हो ।■
शालिगराम सुरति से सेंवैं, ज्ञान समुद्र दाना हो ।। ३
षट् दर्शन जाके संगि चाले, गावत बानी नाना हो ।■
अपना अपना ईष्ट संभालैं, बांचैं पोथी पाना हो ।। ४
चददरि फूल विछाये सतगुरु, देखे सकल जिहाना हो ।■
च्यार दाग से रहत जुलहदी,अविगत अलख अमाना हो।। ५
वीर सिहं वघेला करै बीनती, बिजली खान पठाना हो।■
दो चददरि बख्शीस करी है, दीन्हा यौह प्रवाना हो।। ६ 
नूर नूर निर्गुण पद मेला, देखि भये हैराना हो ।■
पद ल्यौलीन भये अविनाशी, पाये पिण्ड न प्राना हो।। ७ 
शब्द सरुप साहिब सरबंगी, शब्दें शब्द समाना हो ।■
दास गरीब कबीर अर्श में, फरकैं धजा निशाना हो ।। ८
    
    काशी और मगहर  के बारे में गरीब दास का निम्न कथन प्रचलित हैं कि :-

    काया काशी मन मगहर , दहूॅ के मध्य कबीर ।
    काशी तजि मगहर गया, पाया नहीं  शरीर ।।■
    काया काशी मन मगहर, दौंह के बीच मुकाम ।
    जहां जुलहदी घर किया, आदि अंत विश्राम ।।■
    श्वेत  वर्ण शुभ रंग है, नगरी अकल अमान ।
    तन मन की तो गमि नही, निज मन का स्थान।।■

गरीब दास  कहते है कि बनारस में कुछ भ्रान्ति हैं, जबकि मगहर में मोती बरस रहा ।


च्यार वर्ण षट आश्रम, बिडरे दोनों दीन। मुक्ती खेत को छाडि करि, मगहर भये ल्यौ लीन ।।□
नीलख बोडी विसतरी, बटक बीज विस्तार। केशो कल्प कबीर की, दूजा नहीं गंवार ।।□
मगहर  मोती बरष हीं, बनारस कुछ भ्रान्ति। कासी पीतल क्या करै, जहां बरसै पारस स्वांति ।।□
मगहर  मेला ब्रह्म स्यों, बनारस बन भील । ज्ञानी ध्यानी संग चले,
निन्दा करैं कुचील ।।□
मुक्ति खेत कूॅ तजि गये, मगहर में दीदार, जुलहा चमरा चित बसैं, ऊंचा  कुल धिक्कार ।।□
च्यार वर्ण षटआश्रम,कल्प करी दिल मांहि।काशी तजि मगहर गये।
ते नर मुक्ति न पांहि ।।□
भूमि भरोसे बूडि है, कल्पत है दहूॅ  दीन। सब का सतगुरु कुल धनी, मगहर भये ल्यौलीन ।।□
काशी मरै सो भूत होय, मगहर  मरै सो प्रेत। ऊंची भूमि कबीर की,
पौढ़े आसन श्वेत।।□
काशी पुरी कसूर क्या,मगहर मुक्ति क्यों होय।जुलहा शब्द अतीत थे, जाति वर्ण नहीं कोय।।□

संत कबीर के मगहर आगमन का एक सुन्दर व सजीव चित्रण,  संत गरीब दास की चौपाई से :-

चले कबीर मगहर के तांई, तहां वहां फूलन सेज बिछाई ।
दोनों दीन अधिक परभाऊ, दोषी दुश्मन और सब साऊ।।
तहां बिजली खां चले पठाना,बीर सिंह बघेला पद प्रवाना।
काशी उमटि चली मगहर कूॅ, कोई न पावै तास डगर कूॅ।।
वैरागी सन्यासी  योगी, चले मगहर को शब्द  वियोगी ।
तीन रोज में पौंहचे जाई, तहां वहां सुमिरन राम खुदाई।।
दहूॅ दीन है  बाहां  जोरी,  शस्त्र बाधिं लिये  भर गोरी ।
वै  गाडै  वै  जारन कहीं,  दोनू दीन अधिक ही फही ।।
तहां कबीर कहीं एक भाषा, शस्त्र करै सो ताहीं तलाका।
शस्त्र करै सो हमरा द्रोही, जा की पैज पिछोड़ी होई।।
सुन बिजली खां बात हमारी, हम हैं शब्द रुप निराकारी।
बीर सिंह बधेला विनती कर हैं,हे सतगुरु तुम किस विधि मरहैं।
तहां वहां चादर फूल बिछाये, सिज्या छाडी पदहि समाये।
दो चादर दहूॅ  दीन उठावैं,  ताके मध्य  कबीर न पावैं।।
तहां वहां अविगत फूल सुवासी, मगहर घोर और चौरा काशी।
अविगत रूप अलख निरवाणी,तहां वहां नीर क्षीर दीया छानी।
                                  (पारख को अंग :ग़रीब दास की बाणी)

कबीर दास के निर्वाण के बाद जब चादर उठा कर देखा गया।मृत शरीर के बदलें कुछ फूल मिला,  जिसे मुसलमानों व  हिन्दुओं ने मिलकर दो भाग में कर लिए । नवाब बिजली खां ने मजार बनवाए। कुछ दिन बाद हिन्दुओं ने वीर सिंह वघेल के सहयोग से समाधि बनवाए। जो आज भी विद्यमान है। 


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शनिवार, 3 जनवरी 2026

पिपरहवा स्तूप का अवशेष : जो हांगकांग से वापस आए -



  पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  की  गौरवशाली विरासत 


हांगकांग से वापस रत्नजडित बाक्स 

 उत्तर  प्रदेश  के  पूर्वी भाग  का इतिहास  बड़ा  ही  सार्वभौमिक  व  गौरवशाली  रहा हैं।  जब भारत  के  यशस्वी  प्रधानमंत्री  श्री  नरेन्द्र  मोदी जी  ३  जनवरी  २०२६  को  नई  दिल्ली  के  राय  पिथौरा  सांस्कृतिक  परिसर  में  एक  प्रदर्शनी  में  पिपरहवा  अवशेषों  को  पहली  बार  सार्वजनिक  रूप  से देश  के  सामने  दर्शन  हेतू  प्रस्तुत  करेंगे  तो  एक  बार  पुनः  पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  गौरवान्वित  होगा। 

            द लाइट एंड द लोटस,रेलिक्स आफ द अवेकेंड वन         



  • बौद्ध  ग्रन्थ अंगुत्तर  निकाय  के अनुसार  भगवान  बुद्ध  के  जन्म के पूर्व  ६ ठी  शताब्दी  ईसा  पूर्व  भारत वर्ष  सोलह महा जनपदों  में  बटा  हुआ  था।  भारत के प्रमुखतः चार महा जनपदों की  राजधानी  पूर्वी   उत्तर  प्रदेश  में  रहा।
  • महा जनपद          राजधानी             वर्तमान  भाग   
  1. काशी            वाराणसी                          वनारस  के आस -पास 
  2. वत्स              कौशाम्बी                          इलाहबाद  के  आस -पास  
  3. कोशल           श्रावस्ति                            फैजाबाद , गोण्डा , बहराइच  आदि 
  4. मल्ल            कुशावती                      देवरिया , गोरखपुर , बस्ती  आदि 
  • गौतम  बुद्ध  का  जन्म ५६३ ईसा पूर्व  कपिलवस्तु  के  लुम्बनी  नामक  स्थान ( वर्तमान  में सिद्धार्थ नगर उत्तर  प्रदेश ) पर  हुआ  था। इनके पिता शुद्धोधन शाक्य  गणराज्य  के  प्रमुख  थे। ८० वर्ष की उम्र में  कुशीनारा ( वर्तमान  में  कुशीनगर  उत्तर  प्रदेश ) में ४८३ ईसा पूर्व  महा परि निर्वाण  हुआ। 
  • भारत  में  अभिलेखों  का  प्रचलन सम्राट  अशोक  के  समय  हो  गया था। जिसे तीन  भागों  में  बाटा  गया  हैं। १ - शिलालेख  २ - स्तम्भ लेख  ३ - गुहा लेख 
  • पूर्वी  उत्तर  प्रदेश  में  कई  स्थानों पर  उत्खनन  कार्य  हुआ, कई  अभिलेख  प्राप्त  हुए  जो  यहाँ  के  समग्र इतिहास  के  वैभव  का  परिचय  कराते है। जिनमें कुछ  प्रमुख  अभिलेख -


                                                          
  1. सोहगौरा ताम्र पत्र  अभिलेख बासगांव ,गोरखपुर 
  • काल - मौर्य काल (चन्द्रगुप्त  या  अशोक  के  समय }
  • लिपि / भाषा - ब्राह्मी लिपि /प्राकृत  भाषा 
  • महत्वतत्कालिन  प्रशासनिक  व्यवस्था , कृषि  अर्थ व्यवस्था,शासक  का  कर्तव्य (राज धर्म ) 
      २. पिपरहवा बौद्ध  कलश  अभिलेख ,सिद्धार्थ नगर 

  •  काल - ५ वी  शताब्दी  ई
    सा  पूर्व 
  •  लिपि - ब्राह्मी 
  •  महत्व - सकियान (शाक्यों ) और सुकिति भतिनि (भगवान  बुद्ध के भाइयों )द्वारा  स्तूप  निर्माण 
       ३. रुम्मिन देई अभिलेख ,लुम्बिनी  निकट  सिद्धार्थ  नगर 
   
  • काल -सम्राट  अशोक के  राज्याभिषेक  के २० वर्ष बाद 
  • लिपि - ब्राह्मी  लिपि 
  • महत्व - अशोक  द्वारा धम्म यात्रा  के  दौरान  साक्य मुनि  के याद  में  प्रस्तर  स्तम्भ  स्थापित     
       ४. सारनाथ स्तम्भ लेख (अशोक  स्तम्भ ) वाराणसी 
  •   काल -सम्राट  अशोक   २५०  ईसा  पूर्व 
  •   लिपि -ब्राह्मी लिपि 
  •   भारत  गणतंत्र  का राज्य  चिन्ह 
       ५. प्रयाग स्तम्भ लेख (रानी  का  अभिलेख ) कौशाम्बी 
  • काल - २००  ईसा  पूर्व 
  • लिपि- ब्राह्मी लिपि 
  • महत्व - समुद्रगुप्त  के  समय  दरबारी  कवि  हरिषेण द्वारा रचित , भारत वर्ष का नेपोलियन समुद्रगुप्त, जिसने सोने के सिक्के चलाए। 

       ६. मधुवन ताम्र पत्र  अभिलेख ,मऊ  
  • काल - हर्ष वर्धन ( हर्ष संवत २२ ) ६३१ ईसा 
  • भाषा - संस्कृत 
  • महत्व - भूमिदान /प्रशासनिक  व्यवस्था 
        ७. स्कन्दगुप्त का भितरी  स्तम्भ अभिलेख सैद्पुर, गाजीपुर 

  • काल -४५५  ई -४६७ ई 
  • लिपि - उत्तर  ब्राह्मी लिपि /संस्कृत भाषा 
  • महत्व -गुप्तवंश  की  वंशावली /पुष्पमित्रों  का अभिलेख 

           पिपरहवा ( कपिल वस्तु ) का उत्खनन  कार्य  १८९८ ई. व्रिटिश उत्खननकर्ता विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्व्रारा कराया  गया  था।  उत्खनन  के  अधिकांश  भाग  भारतीय  संग्रहालय  कोलकता  को  सौंप दिए थे। अवशेष  के  कुछ  भाग  अपने  पास  रख  लिये।  जिसमें क्रिस्टल  के  ताबूत , हड्डियों  के  टुकड़े , सोने  के आभूषण आदि  बस्तुए  हैं। 

            विलियम  के  चौथे पीढ़ी  के  लोगों  के  द्वारा  इन्हीं  अवशेषों   को  ७  मई  २०२५  को  हांगकांग  में  निलामी  बाजार  में  लाया  जाना  था।  इस  नीलामी  को  रोकने  के  लिये  सिद्धार्थ  विश्वविद्यालय  के  प्राचीन  इतिहास  के  प्रोफेसर   शरदेन्दु  कुमार  त्रिपाठी  ने प्रधानमंत्री  मोदी  को  पत्र  भेजा। भारतीय  पुरातत्व  सर्वें  ( ए  एस  आइ ) ने  हांगकांग  में  भारतीय   दूतावास  से  सम्पर्क किया।  ३०  जुलाई  २०२५  को भारत  के  संस्कृति  मंत्रालय  व  गोदरेज  ग्रुप  के पिरोज  शा  के सहयोग  से  भारतीय  अस्मिता  को  127 वर्ष बाद वापस भारत लाया  जा  सका। 

              ३  जनवरी  २०२६  को  नई  दिल्ली  में  सार्वजनिक  दर्शन  हेतु  रखा  जायेगा।  बौद्ध  धर्म  के  अनुवाईयो  के  लिए  महत्व  का  दिन  होगा। वर्तमान एशिया में लगभग 45 करोड़ बौद्ध रहते है। आज के समय में विश्व सुलह और शान्ति के लिए बौद्ध धर्म  का उपयोग  स्वभाविक है। भारत के परिप्रेक्ष्य  में बौद्ध धर्म एक साफ्ट पावर है। आज बौद्ध धर्मावलम्बी कम्बोडिया, लाओस ,म्यांमार , थाईलैंड, वियतनाम, श्रीलंका, जापान, तिब्बत,  चीन, कोरिया,भूटान आदि देशों में भारत से ही गए।  सार्वभौमिक होकर  बौद्ध धर्म  का प्रचार किए। भारत को आज ज़्यादा से ज़्यादा मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति में हमें बौद्ध धर्म सहायक हो सकता है। जिससे पूर्वी उत्तर प्रदेश गौरवान्वित होकर भगवान बुद्ध, भगवान महावीर,संत पुरुष कबीर और गोरखनाथ की वाणी को पुनः जागृत कर सके।
                                                                                                                                              *  ब्रह्मानंद गुप्ता  *






























शुक्रवार, 29 जून 2018

मगहर : एक अध्ययन

               

        मगहर  का  एक  ऐतिहासिक विवेचन व व्याख्या



                        संत कबीर अकादमी व शोध संस्थान का नवनिर्मित भवन               

  

   इ तिहास  के  पन्ने  में मगहर एक  वैभवशाली  स्थल  है। परन्तु इसके विषय  में तमाम  भ्रांतियां  पैदा  की गई। मगहर  मरे  सो गदहा होए। इन्ही भ्रांतियों  को तोड़ने  के लिए सन्त ने मगहर का चुनाव किया। क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम रिदै बस मोरा। जो काशी तन तजै कबिरा, रामे कौन निहोरा। मगहर  के इतिहास पर नजर डाले -
  • वैदिक संस्कृति १५०० ईसा पूर्व  से ६०० ईसा पूर्व के काल को माना गया है। यह भूभाग इच्छवाकु वंश के सूर्यवंशी राजाओं के समय से ही कौशल देश का हिस्सा रहा। 
  • शतपथ ब्राम्हण  में कौशल का उल्लेख है। यह वैदिक आर्यों  का देश रहा। अयोध्या के प्रतापी राजा राम के बेटे कुश ने   कौशल पर राज्य किया। 
  • महाभारत काल में पाण्डु पुत्र पाण्डवों व उनकी माता कुन्ती अज्ञातवाश के समय कुछ समय यहां व्यतित किया। मान्यता है कि ताम्र गढ़ (वर्तमान में तामेश्वेर नाथ  स्थल ) जो मगहर से दछिण पश्चिम लगभग ७ किमी. पर स्थित है। माता कुंती ने भगवान शिव का पूजन व जलाभिषेक किया।
  • एक अन्य घटना का इतिहास है कि राजा विराट के गायों  की रखवाली करते हुए भीम का आगमन। वर्तमान में गोरखनाथ मंदिर के समीप तालाब के पास भीम की लेटी हुई मूर्ति ,जो बहुत पुरानी है। पाण्डवों के आगमन का प्रमाण है। 
  •  बौद्ध ग्रन्थ  अंगुत्तर  निकाय  के अनुसार ६०० ईसा पूर्व भारत वर्ष १६ महा जनपदों में बटा रहा।यह भूभाग  कौशल महा जनपद का अंग था। 
  • ५४० ईसा पूर्व संसारिक समस्याओं से व्यथित होकर ज्ञान की खोज में अपना राज्य त्याग कर सिद्धार्थ (बाद में गौतम बुद्ध ) ने ताम्र गढ़ (वर्तमान में तामेश्वेरनाथ ) में मुंडन करवाया तथा  राजशी वस्त्र व वत्कल का त्याग किया। 
  • अनोमा नदी (वर्तमान में आमी ) बौद्ध साहित्य की प्रसिद्ध नदी है। मुंडन के पश्चात सिद्धार्थ अपने घोड़े कंथक से इस नदी को पार किया। वह स्थान  कुदवा (खुदवा नाला )कहलाया।  मगहर से  सटे ग्राम मुहम्दपुर कठार  के बगल खुदउआ  स्थित है। 
  • ५३४ ईसा पूर्व हर्यक वंश का संस्थापक बिंबसार बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने मगध पर शासन करते हुये वैवाहिक सम्बन्धों से कई राज्यों को पर अपना अधिकार कर लिया। कौशल को मगध राज्य के अधीन कर लिया। 
  • ४९३ ईसा पूर्व बिंबसार का पुत्र अजात शत्रु मगध पर शासन किया। जनश्रुति है कि अजात शत्रु देशाटन के लिये इधर से गुजर रहा था।अस्वस्थ होने पर  कुछ दिन विश्राम किया।कुछ चरवाहे लूट लिए। नामकरण मार्ग +हर  जो कालांतर मे मगहर हो गया। 
  • २६९ ईसा पूर्व मगध पर अशोक महान  का शासन रहा। 
  • युवान  च्वांग  के वर्णन के अनुसार ताम्र गढ़  के निकट मौर्य सम्राट अशोक के तीन स्तूप स्थित  बताया गया है। महायान डीह ग्राम  के आस -पास तीन डूहो  के रूप मे आज भी विद्यमान है। जो मगहर से दो मील दछिण - पश्चिम स्थित है। *१ 
  • कोपिया टीला खलीलाबाद के उत्तर दिशा मे स्थित है, इस स्थान की खुदाई में कुषाण कालीन  सिक्के, कांच के चूडिया, कांच की वस्तुये व मृदभाण आदि मिले।  कुषाण काल के बहुत पहले से यहां काँच उद्योग विकसित था। सिक्कों पर कुषाण  शासक  विम  कडफ़ाइसिस द्वारा प्रयुक्त नंदीपद  ( ऊँ  )जैसी आकृति अंकित है। *२ 
  • ५०० ई. से  ६०० ई. तक यह भूभाग मगध  के नियंत्रण में था। 
  • ६०० ई. में गुप्त शासन के पतन के बाद नया शासक मौखरी हुआ। जो अपनी राजधानी कन्नौज को बनाया। हषवर्द्धन इस वंश का प्रमुख शासक रहा। 
  • ८३६ ई. से ८८५ ई. तक गुर्जर प्रतिहार  मिहिर भोज  का शासन। 
  • १००० ई. में थारू जाति के मदन सिंह का इस भूभाग पर अधिकार। 
  • मगहर  में  थारूओं  का बहुत समय तक अधिपत्य रहा। जिनके प्रमाण मगहर व निकटस्थ घनश्यामपुर, मुहम्दपुर  कठार, मोहद्दीनपुर आदि ग्रामों में फैला है। *३ 
  • ११७० ई. से ११९४ ई. गहड़वाल  वंश जयचन्द  का शासन। 
  • १२०० ई. में मुस्लिम शासक मोहम्मद  गोरी  का अधिकार। कन्नौज तुर्को  के कब्जे में हो गया। 
  • १२२५ ई. में इल्तुतमिश  का बेटा अवध का गवर्नर बना। यह भूभाग अवध के कब्जे में आ गया। 
  • १२७५  ई. में  राजपूत सरनेट (श्रीनेत / सूर्यवंशी ) सर्वप्रथम आये।  मुख्यतः मगहर में  बसें। मगहर में सवरधीर  राज  के पास कोटिया  के बड़े भूभाग पर आज भी अवशेष मौजूद है।*४  
  • राजपूत  वंश के प्रमुख चन्द्रसेन  ने गोरखपुर  व पूर्वी बस्ती से डोम कटारो को खदेड़ा। चन्द्रसेन के बाद उनका पुत्र जयसिंह उत्तराधिकारी बना। सरनेट कठेलवाड़ों  ने बांसी ,मेहदावल व रतनपुर (मगहर ) में शासन।सरनेट  राजा राम सिंह की कुलदेवी समय माता थी। 
  • १३५१  ई. फिरोज तुगलक का दिल्ली पर  शासन। जौनपुर  नगर की स्थापना। १३९४  ई. जौनपुर  के मलिक  सरकार ख्वाज़ा जहां ने विद्रोही जमींदारों  को पराजित  कर अपना राज्य कन्नौज  से  बिहार तक फैलाया। 
  • काशी के लहरतारा  स्थान पर १३९८ ई. में  कबीर साहब जन्म। नीमा और नीरू  के पले  और बढ़े। 
  • १४७९  ई. मे  बहलोल लोदी के  कहने पर   ख़्वाजा  जहां ने जौनपुर  को स्वतन्त्र राजधानी बनाया। 
  • १४९४ ई. में सिकंदर लोदी  का शासन।  १५०४ ई. सिकंदर लोदी  आगरा के  आगमन  के बाद  जौनपुर आया। उस  समय  कबीर  काशी  के सिद्ध संत पुरुष  हो  गये  थे। कुछ विधर्मियों  ने सिकंदर साह से कबीर दास  की शिकायत  की। सिकंदर  ने दंड  देने का असफल प्रयास किया। *५   
  • १५०३ ई. के लगभग मगहर में आगामी १२ वर्षो  तक जल वृष्टि  न होने  के कारण अकाल। 
  • १५१४ ई. में कबीर दास का मगहर आगमन।  नवाब बिजली खान  ने मगहर  में  जल वृष्टि  कराने  हेतु  कबीर दास को ले आये। मगहर  आने की जनमानस  में  तमाम  कथाएँ  हैं। 
  • १५१५ ई. गुरुनानक जी गोरखपुर के गुरु द्वारा जटा शंकर  आये  थे।*६  
  • सिद्ध बैष्णव सन्त केसरदास के भण्डारे में  गुरु नानक  आदि सन्तों  का कबीर दास  से मिलन। केसरदास के नाम पर कसरवल ग्राम का नाम। गोरख तलैया  आज भी प्रसिद्ध। यहाँ आमी  नदी की धारा मुड़ गई हैं। तत्कालीन समय में मगहर आम़ी नदी के तट  पर चार पंथों का शास्त्रार्थ होना मगहर  के महत्व को रेखांकित करता हैं।
  •  १५१८ ई. में कबीर दास का प्रयाण। 

           परिसिष्ट सूची :

  1. वी. सी.लाल : जागर्फी  ऑफ द अर्ली बुद्धिज़्म 
  2.  डॉ.आलोक कानूनगो : डेक्कन कॉलेज पुणे 
  3. ऊसर मगहर : स्मारिका, मगहर महोत्सव १९९५
  4.  ऊसर मगहर :  ब्रह्मानन्द गुप्ता संपादक 
  5.  गुरु ग्रन्थ साहिब 
  6. गुरु साहब का इतिहास 



     पू र्वी उत्तर प्रदेश का सम्पूर्ण इतिहास आध्यत्मिक एवं धार्मिक उत्कृष्ताओ से भरा पड़ा है | यहां की मिट्टी के एक -एक कण में आपार सांस्कृतिक लड़ियाँ फैली है | सन्त कबीर नगर जनपद के पूर्वी छोर पर आमी (अनोमा ) नदी के तट पर मगहर हिन्दू - मुस्लिम एकता का तीर्थ कहलाता है| जहाँ पर महान सूफ़ी सन्त कबीर दास का एक ही प्रांगण में समाधि व मजार दोनों बना हैं | 
                       
मगहर  स्थित  सन्त  कबीर  की समाधि  स्थल  व मज़ार 


                   सन्त कबीर  की ६२० वी जन्म सती पर विशेष 
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सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

तासे तो कौआ भला,तन मन एकहि रंग- सन्त कबीर दास

  

          आ ज  जब समाचार चैनलों पर ढोंगी बाबाओं ,तथाकथित सन्त - महात्माओं के ढोंग व्यभिचार के तमाम कारनामें हिंदुस्तान के कोने -कोने से उजागर होते हैं ,तो मन खिन्न हो जाता है कि क्या यही हमारा अतीत है। हम किस दिशा में जा रहे है। इतना ही नहीं ऐ तथाकथित बाबा हमारे साधू -संतो की वाणियों को अपना ढ़ाल बनाकर खुद को भगवान घोषित करने से नही चूकते। जब समाचारों में इन नकली बाबाओं का पोल खुलता है, तब तक देर हो चुका होता हैं। लाखों भोले - भाले लोग  ठगे जा चुके होते है। इन तथाकथित गुरुओं पर विश्वास   कर लोग खुद ही शर्म  से झुक जाते है। देश में परमार्थ में घुसे हुए नकली साधुओं की पहचान बहुत जरुरी  हैं।                  

           ह मारा देश सदियों से साधू - सन्तों की पावन भूमि रहा। समय -समय पर सन्तों ने जन्म लेकर अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा दी।  परमार्थ का दिखावा कर लोगों  को ठगने वाले  इन नकली  साधुओं की समस्या को सन्त कबीर दास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था।  और बोल पड़े -                                       
                 
                 कबीर कलियुग कठिन हैं ,
                                                       साधु न  मानै  कोय। 
                  कामी   क्रोधी  मस्खरा , 
                                                     तिनका  आदर  होय।

          बीर दास जी कहते कि सच्चे सन्त को कम ही लोग मानते है ,जो कामी ,क्रोधी और हंसी -मजाक  करने में माहिर हैं, उन्हीं का सत्कार हो रहा। कलि खोटा ,जग अंधरा।   और सन्त कबीर दास जी ने नकली बाबाओं को कहने से नहीं चुकें -
                       
                           नाचै - गावै  पद  कहै ,
                                                   नाहीं  गुरू सो  हेत। 
                   कहै कबीर क्यों नीपजै,
                                                   बीज  बिहूना  खेत । 

          हुरुपिया  बन कर समाज के सामने कथा - कीर्तन में नाचते - गाते है। लोगों को भ्रम  में  डाल कर  पतित कार्य करने से नही चूकते। सन्त कबीर दास जी कहते है -

                            बाना पहिरे सिंह का ,
                                                  चलै  भेड़ की  चाल। 
                   बोली बोले सियार की,
                                                   कुत्ता  खावै  फाल।
           
           पटी  साधु - वेष धारियों  की पोल खोलते हुए, जनमानस को सचेत करते  हुये सन्त  कबीर साहब कहते है।  भेष देख कर आप इन बहुरूपियों की पहचान नहीं  कर सकते। पहले आप इनके ज्ञान और मन के  मैल   की पहचान करे ,तब इन पर विस्वास करें।

                            भेष  देख मत भूलिये ,
                                                    बूझि लीजिये ज्ञान। 
                   बिना कसौटी होत नहि, 
                                                     कंचन  की पहचान। 
                                           ****       ****
                   बोली ठोली मस्खरी ,
                                                   हसीं  खेल  हराम।
                   मद माया और इस्तरी ,
                                                   नहि  सन्तन के काम। 
                
               बीर  साहेब  कहते है कि हास- परिहास , स्त्री - गमन,पद व धन इकढ्ठा  करना , यह सन्तो  का काम नही है। चालाक व धूर्त साधु वेष धारियों ने जिस प्रकार मठ व  शिष्य -शाखा बना कर धन -सम्पदा  का दुरूपयोग कर रहे है ,उस पर भी तीखा प्रहार किया -

                 इसी उदर के कारने ,जग जाच्यो निसि जाम।                                                                                                            स्वामीपनो सिर पर चढ़ो ,सर्यो न एकौ काम।                   इन्द्री  एकौ  बस नहीं , छोड़ि चले परिवार ।                                                                                                            दुनियां  पीछै  यों  फिरै , जैसे  चाक  कुम्हार।               

                     बीर  दास जी कहते है बगुला से कौआ भला है। वह तन - मन दोनों से काला है पर किसी को  छलता नही। मन मैला तन ऊजरा ,बगुला कपटी अंग। तासौ तो कौआ भला ,तन मन एकहि रंग।  और  जन मानस से कहते है कि ऐसे साधू के शरण में जाये ,जिसका मन मलीन न हो -


                         कवि तो कोटिक कोटि है, सिर के मुड़े कोट। 
                 मन  के मूडे  देखि करि, ता संग  लीजै  ओट। 
                                                                           
                                                                         #  ब्रहमा नन्द  गुप्ता  

          

                           

                       
                     
                         
                                
              

बुधवार, 4 सितंबर 2013

                           कबीर काव्य  में  श्रम जीवी  वर्ग 

           संत कबीर श्रम जीवी  थे। स्वयं करघा चलाते थे। शायद यही कारण है कि उनके काव्य में अनगिनत स्थानों पर श्रम जीवी वर्ग व उससे जुड़े आजीविका के साधनों का उल्लेख है। चाहे वों अध्यात्मिक रूपकों के रूप में ही क्यों न हों ?

           संत कबीर की रचनाओ में ग्रामीण परिवेश ,जमीन से जुड़े लोग , मेहनतकश सामजिक  वर्ग   व आजीविका के साधन , छोटे -छोटे  कुटीर उद्योग, कुम्हार ,लोहार,सुनार ,बढ़ई ,माली ,धोबी,चमार , जुलाहा ,कोरी ,वणिक आदि का समावेश है। संत कबीर कर्म में विश्वास करते है। 

           लोहार किस तरह लोहें को पीटकर सामान बनाता है ,संत कबीर कहते है -

                       कबीर  केवल  राम    की ,  तू  जिनी  छाडै  ओट। 

                       घण अहऱणि बिचि ल़ोह ज्यू,घणी सहै सिर चोट।  

           और लुहार की भट्टी में लकड़ी  के जलने कों देखे -

                       दौ  की  दाधी  लकड़ी  ठाढी  करै  पुकार।

                       मति बसि पड़ो लुहार कै, ज़ालै दूजी बार। 

          सोनार के पारखी नज़र -

                        कनक कसौटी जैसे कसि लेई सुनारा। 

                        सोधि    सरीर  भयो  तन  सारा।।

          माली  और मालनि का प्रयोग तो कबीर काव्य में कई जगहों पर है -

                         माली  आवत  देखि  करि कलियन करी पुकार। 

           और मालनि किस तरह वेपरवाह होकर जीव हत्या कर रही ,कबीर कहते है -

                         भूली मालनि पाती तोडै ,  पाती - पाती जीव । 

                         जा मूरति कौ पाती तोडै , सों मूरति  न  जीव।   

            कुम्हार  और उसके चाक को देखे -

                         कबीर हरि रस पौ पिया , बाकी रही न थाकि। 

                         पाका कल्स कुम्हार का,बहुरि न चढ़ई चाकि।

            संत कबीर ख़ुद जुलाहा जाति से थे -

                         कहै कबीर सूत भल काता ,रहट़ा नहीं परम पद पाता। 

             कबीर काव्य में बनजारा और बहेलिया भी है -

                           तब काहें भूलौ बनजारे ,अब आयौ चाहै संगि हमारे। 

             चित्रकार मंदिरों पे नक्कासी बना कर जीविकोपार्जन कर रहे -

                           ऊचा मंदिर  धौलहर म़ाटी चित्री पौलि। 

                           एक ऱाम के ऩाव बिन,जंम पड़ेगा रौलि। 

              संत कबीर कहते है तू मंदिर में ख़ूब चित्रकारी कर लों लेकिन राम नाम बिना जीना भी क्या जीना। मूर्तिकार और मूर्ति कों सम्बोधित करते है -

                            ट़ाचनहारै  ट़ाचिया , दै  छाती  ऊपरि पाव। 

                            ज़े तू मुरति सकल है,तौ घड़ण हारै कौ खाव। 

               नट रस्सी फैला कर उस पर करतब दिखा रहा -

                             जैसे नटिया नट करत है ,लम्बी सरद पसारे। 

               कुऎ से पनिहारिन जल निकाल रही और रस्सी खीचने की कला देख़े -

                             ज्यों पनहरिया भरे कुआ जल ,हाथ ज़ोर सिर नावे। 

                संत कबीर के काव्य में समाज के सभी वर्गो को किसी न किसी रूप में अवश्य स्थान मिला है। जिससे उस समय के देश ,काल व  परिस्थितियों को समझने में मदद मिल सकता है। इस तरफ विद्वानों को ध्यान देने की जरुरत है। कबीर काव्य को सिर्फ एक वर्ग या समुदाय विशेष का मान लेना उचित नहीं होगा। यह सर्व समाज का काव्य है। इस पर सबका बराबर अधिकार है ,जिससे समाज को नई चेतना मिले। संत कबीर कहते है -

                             कहरा है  करि बासनी धरिहू  धोबी है  मल धोऊ । 

                             चमारा है करि रंगौअघोरी,जाति पाति कुल खोऊ।

                संत कबीर के काव्य में श्रम का महत्व है। कर्म की प्रधानता है। भूखे सोने से बेहतर है खाने के लिए कुछ मेहनत करो।  

 

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कबीर काव्य : आर्थिक पक्ष

              संत कबीर गरीब परिवार के है। संत श्रमिक म श्रम की कीमत खूब अच्छे से जानते है। गरीब घर से है तो धन कीमत भी समझते है। फिर भी धन स...