हंस और बगुला दोनों सफेद होते है। लेकिन दोनों में गुण - दोष का अन्तर है। हंस नीर - क्षीर विवेक रखता है। हंस दूध और पानी के मिश्रण से दूध अलग करने की क्षमता रखता है। हंस पारखी होता है।इसे कबीर दास अपने शब्दों में कहते है। दोनों का रंग एक समान, दोनों एक ही स्थान पर रहते भी है। परन्तु आचरण से पहचान करना जरूरी है।
हंस बकु देखा एक रंग, चरें हरियरे ताल।
हंस क्षीर ते जानिये,बकुहिं धरेगें काल।।
कबीर दास के काव्य संग्रह में हंस का प्रयोग कई पदों में हुआ है। हंस के नीर - क्षीर विवेक को कबीर दास के शब्दों में - दूध का दूध, पानी का पानी करना। सही-गलत का पहचान करना।
नीर क्षीर निर्णय करे, हंस लक्ष सहिदान।
दया रूप थिर पद रहे, सो पारख पहिचान।।
पारख - परख का अर्थ है - छानबीन करना, गुण - दोष देखना, अच्छे - बुरे का ज्ञान होना। पारखी का पहचान यानि नीर - क्षीर निर्णय करना। कबीर दास उसे अपना समझते है -
कागा कुबुधि निकट नहि आवैं।
प्रतिदिन हंसा दर्शन पावै।।
नीर क्षीर का करै निवेरा।
कहैं कबीर सोई जन मेरा।।
कबीर काव्य में हंस शब्द का प्रयोग आत्मा के लिए भी किया गया है।
जब गढ़ पर बजी बधाई,तब देख तमासे जाई।
जब गढ बीच होत सकेला,तब हंसा चलत अकेला।।
कबीर दास - 'कर्म फल भोग' को मानते है। जैसा करोगें वैसा भरोगें। भारतीय परम्परा का दार्शनिक पक्ष है। उसे मजबूत कर सम्बोधित करते है।यह शरीर मान सरोवर है, इसमें चेतन हंस निवास करता है। जब हंस उड़कर चला जाता तो बाद में पश्चाताप के अलावा कुछ नही रह जाता।
हंसा सरवर तजि चले,
देही परिगौ सून।
कहहिं कबीर पुकारि के,
तेहि दर तेहि थून।।
कबीर दास को हंस बड़ा प्यारा लगता है -
हंसा तू सुवर्ण वर्ण, क्या वर्णो मैं तोहि।
तरिवर पाय पहेलिहो,तबै सराहौं तोहि।।
सुवर्ण का अर्थ - सुनहले रंग, क्या वर्णो का अर्थ - क्या वर्णन करना, तरिवर का अर्थ - पेड़ और सराहौं का अर्थ - सराहना करना।
कबीर काव्य में हंस शब्द नीर - क्षीर विवेक निर्णय के रूप में और आत्मा के रूप में कई पदों में मिलता है।