ऊसर मगहर

रविवार, 23 जून 2013

राजा देस बड़ा परपंची : कबीर दास

       कबीर का समय: राजनीतिक चुनौतियाँ व निवारण 

साधों, देखा जग बौराना ।
साॅच कहै तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना ।
हिन्दू कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमाना ।
आपस में दोउ लड़े मरतु है, मरम कोई नहिं जाना ।

                                                * सबद ॥ कबीर दास ॥

       सन्त कबीर का समय, उत्तर भारत  में तुगलक  वंश  का अंत और  सिकंदर साह लोदी के शासन का संक्रमण काल। धर्मांतरण का चरमोत्कर्ष काल। 

       सिखों  के प्रसिद्ध पुस्तक  ग्रन्थ साहिब में  सन्त कबीर  पर हुए  अत्याचार  का बड़ा  ही  मार्मिक वर्णन है -

       गंगे के लहरिया में टूट गई जन्जीर,मृग छाला पर बैठे दास कबीर ।
       कहे  कबीर  कोई  संग न  साथ, जल - थल  राखत  है  रघुनाथ ।। 
         
       कबीर दास  ऐसे समय शासक को ललकारने  का साहस करते हैं, जब सत्य की आवाज उठाने का किसी में हिम्मत नही हैं। परिर्वतन सृष्टि का नियम है। राजा सदा बदलता रहेंगा। हर समय एक समान नही होता। अतः राजा को अत्याचार न करने की सलाह देते है। कहते हैं :-

       इक दिन ऐसा होइगा, सब लोग परै बिछोही।
       राजा  रानी  छत्रपति,  सावधान किन होई ।।

      कबीर दास शासक वर्ग  के अत्याचार को चुनौतीपूर्ण स्वीकार कर, जनमानस से कहने में संकोच नही करते :-

आए है सो जाएगें, राजा रंक  फकीर । 
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बधें जंजीर । 

      भारत  में भक्ति काल के  संतों  का  भारतीय पुनर्जागरण  में  बड़ा ही योगदान  रहा । जिसका जन - मानस पर  गहरा प्रभाव पड़ा । 
  • आखिन देखी  का  महत्व .
  • अंध - विस्वास / धार्मिक  विषयो के  स्थान पर कर्म में विस्वास .
  • लोक  भाषा  को  बढ़ावा ,यथा - संस्कृत कूप  गंभीर .
  • अलोच्नातामक  व  अन्वेश / वैज्ञानिक  प्रबृत  पैदा  करना .
  • मानवता वादी  विचार धारा  का  विकास .
  • समतामूलक  समाज की अवधारणा.
  • आर्थिक पक्ष पर समानता
      सन्त कबीर दास के समय बार-बार शासक अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद, फिर  दौलताबाद से दिल्ली कर रहा। जिससे जन - धन  की हानि हो रही। ऐसे शासक को  कबीर यमराज  कह कर सम्बोधित करते है:-

  राजा देस बड़ौ परपंची, रैयत रहत उजारी।
  इतते उत, उतते इत रहु, यम की साँड़ सवारी ।
  घर के खसम बधिक वे राजा,परजा क्या छों कौ बेचारा ।
       

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