सन्त कबीर : भारत में सामाजिक पुनर्जागरण
सन्त कबीर दास की जयन्ती पर विशेष आलेख
Renaissance (रेनेसां) का अर्थ पुनर्जागरण होता हैं। यह फ्रेंच भाषा से लिया गया शब्द है। जिसका शाब्दिक भावार्थ है फिर से जागना । यूरोप आदि पश्चिमी देशों में 14 वीं से 17 वीं शदी के बीच में धर्म, संस्कृतिक, विज्ञान, कला के क्षेत्र में महान बदलाव व पुनरूत्थान को रेनेसा कहा जाता हैं।
भारत में सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन में योगदान के कारण 'राजा राम मोहन राय ' को भारतीय पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है। जबकि भारत में 14 वीं शदी में कबीर दास ने पुनर्जागरण का अलख जगा दिया था। भारत में कबीर दास के योगदान को कमतर नहीं माना जा सकता।
इतिहास में इसे अजब संयोग ही कहेगें। एक तरफ विश्व के कई यूरोपीय देशों में रेनेसा (पुनर्जागरण ) हो रहा था। तो दूसरीं तरफ भारत में भी ठीक उसी समय सांस्कृतिक, आध्यत्मिक, सामाजिक व साहित्यिक पुनर्जागरण की हवा बह चला था। जो भारत के दछिणीं प्रदेशों में शुरु होकर उत्तर भारत में बहने लगा । सदियों से दबे - कुचले समाज में तत्कालीन शासक वर्ग,धर्म के ठेकेदारों , मुल्ला - मौलवियों , पंंडित - पुरोहितों पर गुस्सा व छोभ व्याप्त हो गया था । जिसे भारतीय संतो ने विशेष कर संत कबीर दास ने शोषित वर्ग की पंक्ति मे खड़ा होकर, आवाज बुलन्द कर जनमानस के गुस्सें का इजहार करते हुए लोगों के आत्म- सम्मान के लिए ललकारा और कहा -
कबिरा खड़ा बाजार में , लिये लुकाठी हाथ । जो घर फूकें आपणा, चले हमारे साथ ।।
उत्तर प्रदेश के पूर्वी ज़िलों में लुकाठी शब्द आग से जलते हुये लठें को कहते है , यहां लुकाठी मशाल का पर्याय है । जो मशाल सन्त कबीर ने जलाई , उसे समकालीन व परवर्ती सन्त कवियों ने कायम रखा । मशाल की लौ आज भी इस ऊंच - नीच, भेदभाव की ऊंची खाई को पाटनें में महत्व रखता हैं।
यूरोपीय देशों में सामन्तवाद के विरोंध व ईश् निन्दा के कारण निकोलस कोपेरनिकस ( 1473 - 1543 ई. ), गणितज्ञ ब्रूनो ( 1548 - 1600 ई. ), गेलेलियों ( 1564 - 1642 ई. ) आदि न जाने कितनों को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी। कितनों को दर - दर की ठोकरें खानी पड़ी । न जानें कितनों कों देश निकाला हुआ।
भारत में भी सन्त कबीर ( 1398 - 1518 ई. ) को शासन सत्ता का विरोंध सहना पड़ा । सिकंदर लोदी ने सेख तकी के कहने पर कबीर दास को गंगा में फेकनें व हाथी से कुचलनें जैसी सजा दी । कबीर दास अन्धविश्वास से परे आखिन देखि की बात कह कर अनुभव की बात करते हैं। कबीर दास को सुनी - सुनाई बात पसन्द नही। तत्कालीन काशी के विद्वत समाज में, मुक्ति की नगरीं में आखिन देखिन की बात करना, लिखी - लिखाई बात पर विश्वास न करना, संत कबीर को अगली पंक्ति में खड़ा कर देता ।
सन्त कबीर ने अपने तीखें शब्द बाण से बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन की शुरूआत किया।पुनर्जागरण का जो मुख्य कारक यूरोप में था, वही कारक
भारत में भी सन्त कबीर के उद्धघोष कारण बना।
- मानवतावाद ( Humanism )
- व्यक्तिवाद ( Individualism )
- वैज्ञानिक सोच / अनुभव ( Scientific Aproch / Experiment )
- धर्म सुधार ( Reformation )
- तार्किक ज्ञान ( Logical Thinking )
- सामाजिक भेदभाव ( Social Discrimination)
सन्त कबीर दास के हर शब्द में कहीं न कहीं ये कारक मौजूद हैं। आज के परिवेश में संत कबीर को बार - बार पढ़ने और समझने की जरूरत हैं।
■ ब्रह्मानंद गुप्त
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