MAGHAR : From the Words of Saint Garib Das
मगहर - शब्द जब उच्चारित होता हैं, तो मानस - पटल पर एकाएक संत कबीर दास का नाम आ जाता हैं। काशी जैसा विद्वत समाज, काशी जैसी वैभव व आध्यत्मिक नगरी को छोड़कर मगहर जैसें वीरान व ऊसर स्थल को चुनौतीपूर्ण स्वीकार करना, कबीर जैसा कोई विरला संत ही कर सकता हैं। प्रश्न उठना स्वभाविक हैं कि कबीर दास का मगहर आगमन कैसे व क्यों हुआ ? समकालीन व परर्वती संतों के अनुसार इसके कई कारण हो सकते हैं। यथा -
- क्या मगहर में जन्म स्थान होने के कारण ? जैसा कि गुरु ग्रन्थ साहिब का एक दोहा है - पहले दरसन मगहर पाईओ, पुनि कासी वस आइ । कथनानुसार यहां कबीर दास मगहर से पूर्व परिचित लगते हैं।
- क्या मगहर में सूखाग्रस्त (अकाल) होना व जलवृष्टी के लिए, 1514 ई. में नवाब बिजली खान के अनुरोध पर आए ?
- क्या तत्कालीन राज-सत्ता के विरोध के कारण ? जैसाकि जनश्रुति में प्रचलित हैं। सिकंदर साह लोदी ने दंड देने का कई बार असफल प्रयास किए।
- क्या काशी में तत्कालीन पण्डितों व मौलवियों कें विरोध के कारण बनारस को त्यागना पड़ा ? तत्कालीन पंडित और मौलवी कबीर के तार्किक ज्ञान व प्रमाण से भय महसूस करने लगे।
- क्या तत्कालीन समाज में व्याप्त अन्धविश्वास मगहर मरण से मुक्ति न होना, प्रचलित कथन का संसय दूर करने के लिए ?
संत कबीर दास अपने जीवन के अंतिम दिनों में मगहर आए, और मगहर में 1518 ई. में निर्वाण हुआ। आदि ग्रन्थ में एक पद मिलता है, बनारस के साथ वे अपना सम्बन्ध जल विन मछली जैसा कहते है। बहुत ही दुखीं मन से काशी का त्याग करते हैं।
ज्यों जल छाड़ि बाहर भयो मीना।पूरब जनम हौं तप का हीना। अब कहु राम कवन गति मोरी।तजिले बनारस मति भइ थोरी । बहुत बरस तप किया कासी। मरनु भया मगहर की वासी । कासी मगहर सम बिचारी। ओछी भगति कैसे उतरसि पारी । कहु गुर गजि सिव संभु को जानै।मुआ कबीर रमता श्री रामै।
इन सभी प्रश्नों के उत्तर के तलाश में हमें, संत कबीर के समकालीन व परवर्ती सन्तों के साहित्य व उनके शब्दों को देखकर समझना आसान होगा। मगहर आगमन के बारें में कबीर दास व उनके प्रमुख शिष्य धर्मदास की वाणी, श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, संत गरीब दास का रत्न सागर, संत मलूक दास की वाणी आदि कई परवर्ती सन्तों के उद्धरण मिलते हैं। संत नाभा दास ,भक्त माल में कबीर के बारे में लिखा। संत पीपा, रैदास, दादू आदि कई संन्तों, मोहसिन फानी द्वारा रचित दबिस्तान ए तवारिख, खजीनत उल असफियां में भी उल्लेख हैं।
संत गरीब दास (1717 - 1778 ई.) मगहर के बारे में अपने सदग्रंथ साहिब (रत्न सागर) में कई बार ज़िक्र किए है। संत गरीब दास कबीर पंथ के अनुआई थे। कबीर दास पर उन्होंनें हजारों पद लिखें हैं। लेखक भलेराम बेनीवाल के पुस्तक - जाट योद्धाओं का इतिहास के अनुसार संत गरीब दास का जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन संवत 1774 (1717 ई.) को ग्राम छुड़ानी,रोहतक (हरियाणा) में हुआ था। अनुराग सागर व कबीर चरित्र बोध में संत कबीर के बारह पंथों का विवरण मिलता हैं। बारहवाँ पंथ गरीब दास पंथ है। बन्दीछोंड़ गरीब दास लिखते हैं -
सत गुरु कीन्हा मगहर पियाना हो।■
दोन्यूं दीन चले संगि जाकै, हिंन्दू मुसलमाना हो ।। १
मुक्ति खेत कूॅ छाडि चले है, तजि काशी असथाना हो।■
शाह सिकन्दर कदम लेत है, पतिशाह सुलताना हो ।। २
च्यार वेद के बकता संगि हैं, खोजी बड़े बयाना हो ।■
शालिगराम सुरति से सेंवैं, ज्ञान समुद्र दाना हो ।। ३
षट् दर्शन जाके संगि चाले, गावत बानी नाना हो ।■
अपना अपना ईष्ट संभालैं, बांचैं पोथी पाना हो ।। ४
चददरि फूल विछाये सतगुरु, देखे सकल जिहाना हो ।■
च्यार दाग से रहत जुलहदी,अविगत अलख अमाना हो।। ५
वीर सिहं वघेला करै बीनती, बिजली खान पठाना हो।■
दो चददरि बख्शीस करी है, दीन्हा यौह प्रवाना हो।। ६
नूर नूर निर्गुण पद मेला, देखि भये हैराना हो ।■
पद ल्यौलीन भये अविनाशी, पाये पिण्ड न प्राना हो।। ७
शब्द सरुप साहिब सरबंगी, शब्दें शब्द समाना हो ।■
दास गरीब कबीर अर्श में, फरकैं धजा निशाना हो ।। ८
काशी और मगहर के बारे में गरीब दास का निम्न कथन प्रचलित हैं कि :-
काया काशी मन मगहर , दहूॅ के मध्य कबीर ।
काशी तजि मगहर गया, पाया नहीं शरीर ।।■
काया काशी मन मगहर, दौंह के बीच मुकाम ।
जहां जुलहदी घर किया, आदि अंत विश्राम ।।■
श्वेत वर्ण शुभ रंग है, नगरी अकल अमान ।
तन मन की तो गमि नही, निज मन का स्थान।।■
गरीब दास कहते है कि बनारस में कुछ भ्रान्ति हैं, जबकि मगहर में मोती बरस रहा ।
च्यार वर्ण षट आश्रम, बिडरे दोनों दीन। मुक्ती खेत को छाडि करि, मगहर भये ल्यौ लीन ।।□
नीलख बोडी विसतरी, बटक बीज विस्तार। केशो कल्प कबीर की, दूजा नहीं गंवार ।।□
मगहर मोती बरष हीं, बनारस कुछ भ्रान्ति। कासी पीतल क्या करै, जहां बरसै पारस स्वांति ।।□
मगहर मेला ब्रह्म स्यों, बनारस बन भील । ज्ञानी ध्यानी संग चले,
निन्दा करैं कुचील ।।□
मुक्ति खेत कूॅ तजि गये, मगहर में दीदार, जुलहा चमरा चित बसैं, ऊंचा कुल धिक्कार ।।□
च्यार वर्ण षटआश्रम,कल्प करी दिल मांहि।काशी तजि मगहर गये।
ते नर मुक्ति न पांहि ।।□
भूमि भरोसे बूडि है, कल्पत है दहूॅ दीन। सब का सतगुरु कुल धनी, मगहर भये ल्यौलीन ।।□
काशी मरै सो भूत होय, मगहर मरै सो प्रेत। ऊंची भूमि कबीर की,
पौढ़े आसन श्वेत।।□
काशी पुरी कसूर क्या,मगहर मुक्ति क्यों होय।जुलहा शब्द अतीत थे, जाति वर्ण नहीं कोय।।□
संत कबीर के मगहर आगमन का एक सुन्दर व सजीव चित्रण, संत गरीब दास की चौपाई से :-
चले कबीर मगहर के तांई, तहां वहां फूलन सेज बिछाई ।
दोनों दीन अधिक परभाऊ, दोषी दुश्मन और सब साऊ।।
तहां बिजली खां चले पठाना,बीर सिंह बघेला पद प्रवाना।
काशी उमटि चली मगहर कूॅ, कोई न पावै तास डगर कूॅ।।
वैरागी सन्यासी योगी, चले मगहर को शब्द वियोगी ।
तीन रोज में पौंहचे जाई, तहां वहां सुमिरन राम खुदाई।।
दहूॅ दीन है बाहां जोरी, शस्त्र बाधिं लिये भर गोरी ।
वै गाडै वै जारन कहीं, दोनू दीन अधिक ही फही ।।
तहां कबीर कहीं एक भाषा, शस्त्र करै सो ताहीं तलाका।
शस्त्र करै सो हमरा द्रोही, जा की पैज पिछोड़ी होई।।
सुन बिजली खां बात हमारी, हम हैं शब्द रुप निराकारी।
बीर सिंह बधेला विनती कर हैं,हे सतगुरु तुम किस विधि मरहैं।
तहां वहां चादर फूल बिछाये, सिज्या छाडी पदहि समाये।
दो चादर दहूॅ दीन उठावैं, ताके मध्य कबीर न पावैं।।
तहां वहां अविगत फूल सुवासी, मगहर घोर और चौरा काशी।
अविगत रूप अलख निरवाणी,तहां वहां नीर क्षीर दीया छानी।
(पारख को अंग :ग़रीब दास की बाणी)
कबीर दास के निर्वाण के बाद जब चादर उठा कर देखा गया।मृत शरीर के बदलें कुछ फूल मिला, जिसे मुसलमानों व हिन्दुओं ने मिलकर दो भाग में कर लिए । नवाब बिजली खां ने मजार बनवाए। कुछ दिन बाद हिन्दुओं ने वीर सिंह वघेल के सहयोग से समाधि बनवाए। जो आज भी विद्यमान है।
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