संतो घर में झगरा भारी।
राति दिवस मिली उठि उठि लागै,
पाँच ढोटा एक नारी।
न्यारो न्यारो भोजन चाहै,
पाँचों अधिक सवादी।। संत कबीर दास
कबीर दास कहते है कि माया ने घर में बड़ा भारी झगड़ा लगा लगा रखा है। माया ही सबको बाँधना चाहती है। पाँच ढोटा यानि पाँच ज्ञानेंद्रियाँ : आँख - सुन्दर रूप से, कान - मीठे बात से, नाक - गंध से, जीभ - स्वाद से और त्वचा - स्पर्श से। पाँचों अकेले बुद्धि से रोज झगड़ा करने पर उतारू है। अतः बुद्धि इनसे परेशान हो गई। बुद्धि इन पाँच को संयम सिखाना चाहती। लेकिन मानने को तैयार नही क्योंकि वे सवादी हो गई हैं। सवादी का अर्थ - भयंकर स्वाद की इच्छा वाला, जो कम होने का नाम ही नही लेता। नया - नया भोजन रोज चाहिए। एक नारी यानि अकेले बुद्धि, इनसे कितना लड़े। लड़ाई करते - करते बुद्धि भ्रम में पड़ गई है।
मनुष्य को मायाजाल घेर रखा है। माया मोह के कारण मनुष्य सही-गलत का पहचान नही कर पा रहा। प्रपंच जाल में सभी जीव फंसे है। अज्ञान ही प्रपंच जाल है। समाज व परिवार से भावनात्मक लगाव का स्थान दिखावाँ का हो गया है। जिसमे हम आप सभी दोषी है।
आज के परिवेश में कबीर दास के 600 साल पहले कहा गया शब्द कितना प्रासंगिक हैं। वह सोच से परे हैं। उनका कहा गया एक - एक शब्द शोध का विषय बन गया है। पारिवारिक संबंध खराब होते जा रहे है। सिर्फ औपचारिकता मात्र दिखावां रह गया हैं। भाई - भाई, भाई - बहन, चाचा - भतीजा, पिता-पुत्र सबका आपसी समझ, सम्बन्ध, सम्मान कमजोर होता जा रहा। इस दूरी का कारण आधुनिक युग की भोगलिप्सा, जिससे समाज दूषित व कलुषित हो रहा।
आज के मोबाइल युग में खासकर युवा पीढ़ी, जिसे जेंन जी से सम्बोंधित किया जा रहा। कम्युनिकेशन गैप का शिकार होता जा रहा है। युवा पीढ़ी परिवार से, नाते - रिश्तेदार से दूर होता जा रहा हैं। यह विषय चिन्तन व मनन का है। इस संक्रमण काल में इससे कैसे बचा जाए हमें सोचना होगा।
कबीर दास पारिवारिक सम्बन्धों की औपचारिकताओं का भंडाफोड़ करते है । मृत्यु भोज पर प्रहार करते हुए कहते है-
जीवत पित्रहिं मारहि डंडा, मूवां पित्र लै घालै गंगा।
जीवत पित्र कूं अन न ख्यांवे,मूवां पाछैं प्यंड भरावै।।
जीवत पित्र कूं बोलैं अपराध, मूवां पीछैं देहि सराध।
कहै कबीर मोहि अचरज आवै,कउवा खाइ पित्र क्यू पावै।।
कबीर दास समाज की सच्चाई को दिखाकर कहते है कि जब माता - पिता की सेवा की जरुरत थी, तब तो किआ नही । अरे पगले जब वे इस दुनिया में नही है, तो झूठा दिखावा क्यों कर रहा ? क्यों अपना समय धोखे में बिताए ?
उमरिया धोखे में खोय दियो।
पांच बरस का भोला भाला,बीस में जवान भयो।।
तीस बरस में माया के कारन, देस बिदेस गयो।
चालीस बरस अन्त अब लागे, बाढ़े मोह गयो।।
धन धाम पुत्र के कारन, निस दिन सोच भयो।
बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो।।
लरिका बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।
बरस साठ - सत्तर के भीतर, केश सफेद भयो।।
वात पित कफ घेर लियो है, नैनन नीर बयहो।
न हरि भक्ति न साधू की संगत,न शुभ कर्म कियो।।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, चोला छूट गयो।
उमरिया धोखे मे खोय दियो।।
□ ब्रह्मानंद गुप्त
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें