ऊसर मगहर
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
कबीर काव्य : आर्थिक पक्ष
संत कबीर गरीब परिवार के है। संत कबीर श्रमिक व श्रम की कीमत खूब अच्छे से जानते है। गरीब घर से है, तो धन कीमत भी समझते है। फिर भी धन संग्रह के घोर विरोधी है। अभाव में रहना उन्हे पसन्द है। और कहते है -
भूखा - भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग।
भाँडा घड़ि जिन मुख दिया, सोई पूरण जोग।। ■
भूख - भूख क्या करते हो ? किसे सुनाते हो ? भाँडा घड़ि का अर्थ है - बर्तन बनाना। कबीर दास विश्वास से कहते हैं कि जिसने यह शरीर रूपी भाँड बनाया है, वही भूख की पूर्ति भी करेगा। एक सीमा रेखा रेखांकित करते है। उतना ही धन चाहिए जिससे अपने परिवार का भरण-पोषण हो सके,और दरवाज़े पर से कोई भूखा न जाए।
साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय।
मै भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।। ■
भोग-विलास,भोगवाद - दुनियाभर की एक ही परेशानी है।सीमित मानव की असीमित आवश्यकता आवश्यकतानुसार धन चाहिए।
उदर समाता अन्न लै, तनहि समाता चीर।
अधिकहि संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर।। ■
संत कबीर अधिक संग्रह को निषेध मानते। समाज में असमानता का सबसे बड़ा कारण धन संग्रह को मानते है। उनका मानना है कि अभाव ही ईश्वर के समीप ले जाने कारक है। भोगवाद ही सभी समस्याओं का जड़ है। उतना ही अनाज चाहिए जितने में पेट भरे और उतना ही वस्त्र हो, जिससे तन ढक जा सके।
रूखा सूखा खाय के, ठंड़ा पानी पीव।
देख पराई चुपड़ी, मत ललचावै जीव।। ■
जितना मिले उसी में सन्तोष करो। सन्तोष में ही परम सुख है। बिना मांगे, बिना चाहे जो मिल जाए वो दूध के समान होता। मांग कर जो मिले वो पानी के समान। जिसकों पाने में ज्यादा खींचातानी हो वह रक्त के समान दूषित हैं -
अनचाहे सो दूध बराबर, मांगे मिले सो पानी।
कहहिं कबीर सो रक्त बराबर, जामे ऐंचातानी।। ■
और कबीर दास कहते है कि -
आधी जो रूखी भली, सारी सोग सन्ताप।
जो चाहेगा चूपड़ी, तो बहुत करेगा पाप ।। ■
दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बस उतना ही चाहिए कि दोनों समय का भोजन मिल जाए। दो सेर आटा, आधा सेर दाल और थोड़ा-बहुत घी मिल जाए। दोनों समय का भोजन हो जाए। और इससे ज्यादा की क्या जरूरत ?
दुई सेर मांगउ चूना, पाउ घीउ संगि लूना।
अध सेर मांगउ दाले,मोकउ दोनउ बखत जिवाले।। ■
संत न बांधे गाँठरी, पेट समाता लेई। ■
इससे ज़्यादा हमें क्यों चाहिए ? किसके लिए चाहिए ? जिनको हम संग्रह करके सम्पन्न बनाने में अपना जीवन खपा दे, पता नही वह उसे संभाल पावे। कपूत मिल गया तो चाहें जितना कमा कर संग्रह कर लो, उसे खत्म करने में समय नही लगेगा।
पूत सपूत तो का धन संचै। पूत कपूत तो का धन संचै।। ■
संत कबीर दास समाज में असमानता की खाई को पाटने की पुरजोर कोशिश करते है। आर्थिक - सामाजिक पक्ष का मजबूत आधार तैयार करते है।और दोनों हाथ से उलीचिए की सलाह देते है।
जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।। ■
धन संग्रह हो भी जाए तो दोंनो हाथ से समाज में बाटने को कहते है। जैसे नाविक नाव में ज्यादा पानी होने पर खतरा भाप कर पानी निकालने का यत्न करता है।
अनिश्चित, अनियंत्रित सांसारिक कामनाएँ ही कष्टों की जड़ है। जो इस पर विजय पाया वही इस संसार का राजा है। संत कबीर दास कहते है -
चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।
जाको कछु नाहिं चाहिए, सो साहन को शाह।। ■
कबीर दास उद्यम में विश्वास रखते है। आर्थिक तंगी से निपटने के लिए उद्यम करने को कहते है। जिससे पेट पालने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर ना रहें। परिश्रम व कर्म करके ग़रीबी दूर करने का उपाय बताते है। कहते है कि -
कबीर उद्यम अवगुण को नहीं,जो करि जाने कोय।
उद्यम में आनन्द है, सांई सेती होय ।।■
मनुष्य मान, सम्मान व गर्व सब कुछ खो देता है, जब किसी से कुछ मांगना पड़ता है -
मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह।
ए सबही अहला गया,जबहीं कह्या कुछ देय।।■
कबीर दास उतना ही धन संग्रह करने को कहते है। जिससे आज का पेट पालन कर सके। आगे भी पेट पाल सके। कबीर साहब कहते है -
कबीर सो धन संचिये, जो आगे कूं होई।
सीस चढ़ाये पोटली,ले जात न देख्या कोई।
मृत्यु के बाद धन को कोई गठरी बांध कर ले जाते नही दिखा। यानि सत्कर्म ही मनुष्य के साथ जाता है। मनुष्य धन दौलत यही छोड़कर कर चला जाता है।
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