ऊसर मगहर
सोमवार, 2 फ़रवरी 2026
शुक्रवार, 30 जनवरी 2026
संतों घर में झगरा भारी: संत कबीर दास
संतो घर में झगरा भारी।
राति दिवस मिली उठि उठि लागै,
पाँच ढोटा एक नारी।
न्यारो न्यारो भोजन चाहै,
पाँचों अधिक सवादी।। संत कबीर दास
कबीर दास कहते है कि माया ने घर में बड़ा भारी झगड़ा लगा लगा रखा है। माया ही सबको बाँधना चाहती है। पाँच ढोटा यानि पाँच ज्ञानेंद्रियाँ : आँख - सुन्दर रूप से, कान - मीठे बात से, नाक - गंध से, जीभ - स्वाद से और त्वचा - स्पर्श से। पाँचों अकेले बुद्धि से रोज झगड़ा करने पर उतारू है। अतः बुद्धि इनसे परेशान हो गई। बुद्धि इन पाँच को संयम सिखाना चाहती। लेकिन मानने को तैयार नही क्योंकि वे सवादी हो गई हैं। सवादी का अर्थ - भयंकर स्वाद की इच्छा वाला, जो कम होने का नाम ही नही लेता। नया - नया भोजन रोज चाहिए। एक नारी यानि अकेले बुद्धि, इनसे कितना लड़े। लड़ाई करते - करते बुद्धि भ्रम में पड़ गई है।
मनुष्य को मायाजाल घेर रखा है। माया मोह के कारण मनुष्य सही-गलत का पहचान नही कर पा रहा। प्रपंच जाल में सभी जीव फंसे है। अज्ञान ही प्रपंच जाल है। समाज व परिवार से भावनात्मक लगाव का स्थान दिखावाँ का हो गया है। जिसमे हम आप सभी दोषी है।
आज के परिवेश में कबीर दास के 600 साल पहले कहा गया शब्द कितना प्रासंगिक हैं। वह सोच से परे हैं। उनका कहा गया एक - एक शब्द शोध का विषय बन गया है। पारिवारिक संबंध खराब होते जा रहे है। सिर्फ औपचारिकता मात्र दिखावां रह गया हैं। भाई - भाई, भाई - बहन, चाचा - भतीजा, पिता-पुत्र सबका आपसी समझ, सम्बन्ध, सम्मान कमजोर होता जा रहा। इस दूरी का कारण आधुनिक युग की भोगलिप्सा, जिससे समाज दूषित व कलुषित हो रहा।
आज के मोबाइल युग में खासकर युवा पीढ़ी, जिसे जेंन जी से सम्बोंधित किया जा रहा। कम्युनिकेशन गैप का शिकार होता जा रहा है। युवा पीढ़ी परिवार से, नाते - रिश्तेदार से दूर होता जा रहा हैं। यह विषय चिन्तन व मनन का है। इस संक्रमण काल में इससे कैसे बचा जाए हमें सोचना होगा।
कबीर दास पारिवारिक सम्बन्धों की औपचारिकताओं का भंडाफोड़ करते है । मृत्यु भोज पर प्रहार करते हुए कहते है-
जीवत पित्रहिं मारहि डंडा, मूवां पित्र लै घालै गंगा।
जीवत पित्र कूं अन न ख्यांवे,मूवां पाछैं प्यंड भरावै।।
जीवत पित्र कूं बोलैं अपराध, मूवां पीछैं देहि सराध।
कहै कबीर मोहि अचरज आवै,कउवा खाइ पित्र क्यू पावै।।
कबीर दास समाज की सच्चाई को दिखाकर कहते है कि जब माता - पिता की सेवा की जरुरत थी, तब तो किआ नही । अरे पगले जब वे इस दुनिया में नही है, तो झूठा दिखावा क्यों कर रहा ? जिन्दा रहने पर बोलने से परहेज किआ। अब श्राद्ध कर्म करने से क्या होगा। मृत्यु के बाद कौन देखने आ रहा ? मनुष्य अपना जीवन धोखें में जी रहा।
उमरिया धोखे में खोय दियो।
पांच बरस का भोला भाला,बीस में जवान भयो।।
तीस बरस में माया के कारन, देस बिदेस गयो।
चालीस बरस अन्त अब लागे, बाढ़े मोह गयो।।
धन धाम पुत्र के कारन, निस दिन सोच भयो।
बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो।।
लरिका बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।
बरस साठ - सत्तर के भीतर, केश सफेद भयो।।
वात पित कफ घेर लियो है, नैनन नीर बयहो।
न हरि भक्ति न साधू की संगत,न शुभ कर्म कियो।।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, चोला छूट गयो।
उमरिया धोखे मे खोय दियो।।
□ ब्रह्मानंद गुप्त
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मंगलवार, 13 जनवरी 2026
मगहर : संत गरीब दास के शब्दों में
MAGHAR : From the Words of Saint Garib Das
मगहर - शब्द जब उच्चारित होता हैं, तो मानस - पटल पर एकाएक संत कबीर दास का नाम आ जाता हैं। काशी जैसा विद्वत समाज, काशी जैसी वैभव व आध्यत्मिक नगरी को छोड़कर मगहर जैसें वीरान व ऊसर स्थल को चुनौतीपूर्ण स्वीकार करना, कबीर जैसा कोई विरला संत ही कर सकता हैं। प्रश्न उठना स्वभाविक हैं कि कबीर दास का मगहर आगमन कैसे व क्यों हुआ ? समकालीन व परर्वती संतों के अनुसार इसके कई कारण हो सकते हैं। यथा -
- क्या मगहर में जन्म स्थान होने के कारण ? जैसा कि गुरु ग्रन्थ साहिब का एक दोहा है - पहले दरसन मगहर पाईओ, पुनि कासी वस आइ । कथनानुसार यहां कबीर दास मगहर से पूर्व परिचित लगते हैं।
- क्या मगहर में सूखाग्रस्त (अकाल) होना व जलवृष्टी के लिए, 1514 ई. में नवाब बिजली खान के अनुरोध पर आए ?
- क्या तत्कालीन राज-सत्ता के विरोध के कारण ? जैसाकि जनश्रुति में प्रचलित हैं। सिकंदर साह लोदी ने दंड देने का कई बार असफल प्रयास किए।
- क्या काशी में तत्कालीन पण्डितों व मौलवियों कें विरोध के कारण बनारस को त्यागना पड़ा ? तत्कालीन पंडित और मौलवी कबीर के तार्किक ज्ञान व प्रमाण से भय महसूस करने लगे।
- क्या तत्कालीन समाज में व्याप्त अन्धविश्वास मगहर मरण से मुक्ति न होना, प्रचलित कथन का संसय दूर करने के लिए ?
संत कबीर दास अपने जीवन के अंतिम दिनों में मगहर आए, और मगहर में 1518 ई. में निर्वाण हुआ। आदि ग्रन्थ में एक पद मिलता है, बनारस के साथ वे अपना सम्बन्ध जल विन मछली जैसा कहते है। बहुत ही दुखीं मन से काशी का त्याग करते हैं।
ज्यों जल छाड़ि बाहर भयो मीना।पूरब जनम हौं तप का हीना। अब कहु राम कवन गति मोरी।तजिले बनारस मति भइ थोरी । बहुत बरस तप किया कासी। मरनु भया मगहर की वासी । कासी मगहर सम बिचारी। ओछी भगति कैसे उतरसि पारी । कहु गुर गजि सिव संभु को जानै।मुआ कबीर रमता श्री रामै।
संत गरीब दास (1717 - 1778 ई.) मगहर के बारे में अपने सदग्रंथ साहिब (रत्न सागर) में कई बार ज़िक्र किए है। संत गरीब दास कबीर पंथ के अनुआई थे। कबीर दास पर उन्होंनें हजारों पद लिखें हैं। लेखक भलेराम बेनीवाल के पुस्तक - जाट योद्धाओं का इतिहास के अनुसार संत गरीब दास का जन्म वैशाख पूर्णिमा के दिन संवत 1774 (1717 ई.) को ग्राम छुड़ानी,रोहतक (हरियाणा) में हुआ था। अनुराग सागर व कबीर चरित्र बोध में संत कबीर के बारह पंथों का विवरण मिलता हैं। बारहवाँ पंथ गरीब दास पंथ है। बन्दीछोंड़ गरीब दास लिखते हैं -
काशी और मगहर के बारे में गरीब दास का निम्न कथन प्रचलित हैं कि :-
काया काशी मन मगहर , दहूॅ के मध्य कबीर ।
काशी तजि मगहर गया, पाया नहीं शरीर ।।■
काया काशी मन मगहर, दौंह के बीच मुकाम ।
जहां जुलहदी घर किया, आदि अंत विश्राम ।।■
श्वेत वर्ण शुभ रंग है, नगरी अकल अमान ।
तन मन की तो गमि नही, निज मन का स्थान।।■
गरीब दास कहते है कि बनारस में कुछ भ्रान्ति हैं, जबकि मगहर में मोती बरस रहा ।
संत कबीर के मगहर आगमन का एक सुन्दर व सजीव चित्रण, संत गरीब दास की चौपाई से :-
कबीर दास के निर्वाण के बाद जब चादर उठा कर देखा गया।मृत शरीर के बदलें कुछ फूल मिला, जिसे मुसलमानों व हिन्दुओं ने मिलकर दो भाग में कर लिए । नवाब बिजली खां ने मजार बनवाए। कुछ दिन बाद हिन्दुओं ने वीर सिंह वघेल के सहयोग से समाधि बनवाए। जो आज भी विद्यमान है।
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